अग्नि पुराण

Agni Puran is a one of the major eighteen Puranas of Hinduism. The text is variously classified as a Purana related to Shaivism, Vaishnavism, Shaktism and Smartism.


अग्नि पुराण क्या है? (What is Agni Puran in Hindi)

अग्निपुराण, (Agni Puran) हिंदुओं के पवित्र 18 पुराणों में से एक पुराण है। पुराणों की सूची में इसका स्थान आठवा है। इस पुराण के वक्‍ता भगवान अग्नि देव है, इसलिए इसका नाम ‘अग्निपुराण’ पड़ा। अग्नि देव ने इससे सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ को सुनाया था।

अग्नि पुराण, पुराण सहित्य में अपनी व्यापक दृष्टि तथा विशाल ज्ञान भंडार के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। इसे अनेक विद्वानों ने विषयवस्‍तु के आधार पर ‘भारतीय संस्‍कृति का विश्‍वकोश’ कहा है।


अग्नि पुराण कथा एवं विस्तार (Story & History of Agni Puran in hindi)

अग्नि पुराण, अग्निदेव के श्रीमुख से वर्णित है। यह ज्ञान सर्वप्रथम अग्निदेव ने ब्रह्मा जी के पुत्र “महर्षि वशिष्ठ” को सुनाया था। वशिष्ठ से यह ज्ञान व्यास ऋषि को प्राप्त हुआ।

अग्नि पुराण ज्ञान का विशाल भण्डार है। “आग्नेये हि पुराणेऽस्मिन् सर्वा विद्या: प्रदर्शिता: अर्थात ‘अग्नि पुराण’ में सभी विद्याओं का वर्णन है। 

वर्तमान उपलब्ध अग्निपुराण में कुल 383 अध्याय और 11,475 श्लोक है परन्तु नारदपुराण के अनुसार अग्निपुराण में 15 हज़ार तथा मत्स्यपुराण अनुसार 16 हज़ार श्लोकों होने का उल्लेख मिलता है।


अग्नि पुराण में क्या है? (What is in Agni Puran in Hindi)

अग्निपुराण (Agni Puran) में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) तथा सूर्य की उपासना का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त परा-अपरा विद्याओं का वर्णन, रामायण तथा महाभारत का संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारों की कथाएँ, सृष्टि-वर्णन, दीक्षा-विधि, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओं के मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयों का अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है।

इसमे धनुर्वेद का भी बड़ा ज्ञानवर्धक विवरण दिया गया है जिसमें प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों तथा सैनिक शिक्षा पद्धति का विवेचन विशेष उपादेय तथा प्रामाणिक है। इस पुराण के अंतिम भाग में आयुर्वेद का विशिष्ट वर्णन अनेक अध्यायों में मिलता है, इसके अतिरिक्त छंदःशास्त्र, अलंकार शास्त्र, व्याकरण तथा कोश विषयक विवरण भी दिये गए है।

अत्‍यंत लघु आकार होने पर भी इस पुराण में सभी विद्याओं का समावेश किया गया है। पदम पुराण में भगवान विष्णु के पुराणमय स्‍वरूप का वर्णन किया गया है और अठारह पुराण भगवान के 18 अंग कहे गए हैं। इसमे ‘अग्नि पुराण’ को भगवान विष्‍णु का बायां चरण कहा गया है।


अध्यायानुसार विचार

अध्यायवर्णित विषय
उपोद्घात, विष्णु अवतार वर्णन
२-४मत्स्य, कूर्म, वराह अवतार
५-१०रामायण एवं इसके काण्डों का संक्षिप्त कथन
११-१६अवतार कथाएँ
१८-२०वंशों का वर्णन, सृष्टि
२१-१०३विविध देवताओं की मूर्तियों का परिमाण, मूर्ति लक्षण, देवता-प्रतिष्ठा, वस्तुपूजा तथा जीर्णोद्धार
१०४- १४९भुवनकोश (भूमि आदि लोकों का वर्णन), कुछ पवित्र नदियों का माहात्म्य, ज्योतिश्शास्त्र सम्बन्धी विचार, नक्षत्रनिर्णय, युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए उच्चारण किए जाने योग्य मन्त्र, चक्र तथा अनेक तान्त्रिक विधान
१५० मन्वन्तर
१५१ – १७४वर्णाश्रम धर्म, प्रायश्चित तथा श्राध्दं
१७५ – २०८व्रत की परिभाषा, पुष्पाध्याय (विविध पुष्पों का पूजायोग्यत्व तथा पूजा-अयोगत्व), पुष्प द्वारा पूजा करने का फल
२०९ – २१७दान का माहात्म्य, विविध प्रकार के दान, मन्त्र का माहात्म्य, गायत्रीध्यानपद्धति, शिवस्त्रोत्र
२१८ – २४२राज्य सम्बन्धी विचार – राजा के कर्तव्य। अभिषेक विधि– युद्धक्रमा, रणदीक्षा, स्वप्नशुकनादि विचार, दुर्गनिर्माणविधि और दुर्ग के भेद
२४३-२४४पुरुषों और स्त्रियों के शरीर के लक्षण
२४५चामर, खड्ग, धनुष के लक्षण
२४६ रत्नपरीक्षा
२४७ वास्तुलक्षण
२४८ पुष्पादिपूजा के फल
२४९-२५२धनुर्वेद
२५३258 अधिकरण (न्यायालय) के व्यवहार
२५३-२७८चतुर्णां वेदानां मन्त्रप्रयोगैर्जायमानानि विविधानि फलानि, वेदशाखानां विचारः, राज्ञां वंशस्य वर्णनम्
२७९-२८१ रसायुर्वेद की कुछ प्रक्रियाएँ
२८२-२२९वृक्षायुर्वेद, गजचिकित्सा, गजशान्ति, अश्वशान्ति (हाथी और घोड़ों को कोई भी रोग न हो, इसके लिए उपाय)
२९८ -३७२विविध देवताओं की मन्त्र-शान्ति-पूजा और देवालय महात्म्य
२९८-३७२छन्द शास्त्र आदि
३३७-३४७साहित्य-रस-अलंकार-काव्यदोष आदि
३४८-एकाक्षरी कोश
३४९-३५९व्याकरण सम्बन्धी विविध विषय
४६०-३६७पर्याय शब्दकोश
३६८-३६९प्रलय का निरुपण
३७०-शारीरकं (शरीर और उसके अंगों का आयुर्वेद सम्मत निरुपण)
३७१-नरक निरुपण
३७२-३७६योगशास्त्र प्रतिपाद्य विचार
३७७-३८०वेदान्तज्ञान
३८१-गीतासार
३८२-यमगीता
३८३-अग्निपुराण का महात्म्य

अग्नि पुराण का महत्व (Importance of Agni puran)

अत्‍यंत लघु आकार होने पर भी इस पुराण में सभी विद्याओं का समावेश किया गया है। इस दृष्टि से अन्‍य पुराणों की अपेक्षा यह और भी विशिष्‍ट तथा महत्‍वपूर्ण हो जाता है। पुराणों के पांचों लक्षणों- सर्ग, प्रतिसर्ग, राजवंश, मन्वंतर और वंशानुचरित आदि का वर्णन भी इस पुराण में प्राप्त होता है। 


Last Updated on 08/02/2021