ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma vaivarta Puran
Brahma vaivarta Puran

Short Introduction:- The Brahma vaivarta Purana is a voluminous Sanskrit text and a major Purana (Maha-purana) of Hinduism. It centers around Krishna and Radha, is a Vaishnavism text, and is considered one of the modern era Purana.


ब्रह्मवैवर्त पुराण (What is Brahma Vaivarta Purana in Hindi)

ब्रह्मवैवर्त पुराण हिंदुओं के पवित्र 18 पुराणों में से एक है। पुराणों की सूची में यह दसवाँ पुराण है। व्यास ऋषि द्वारा रचित इस पुराण में कुल अठारह हज़ार 18,000 श्लोक और 218 अध्याय हैं।

यह एक वैष्णव पुराण है। इस पुराण में श्रीकृष्ण को ही प्रमुख इष्ट मानकर उन्हें सृष्टि का कारण बताया गया है। ‘ब्रह्मवैवर्त’ शब्द का अर्थ है- ब्रह्म का विवर्त अर्थात् ब्रह्म की रूपान्तर राशि।

ब्रह्म की रूपान्तर राशि ‘प्रकृति’ है। प्रकृति के विविध परिणामों का प्रतिपादन ही इस ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में प्राप्त होता है। कहने का तात्पर्य है प्रकृति के भिन्न-भिन्न परिणामों का जहां प्रतिपादन हो वही पुराण ब्रह्मवैवर्त कहलाता है।


ब्रह्मवैवर्त पुराण में क्या है? (What is in Brahma Vaivarta Purana in Hindi)

ब्रह्मवैवर्त पुराण में जीव की उत्पत्ति के कारण और ब्रह्माजी द्वारा समस्त भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले जीवों के जन्म और उनके पालन पोषण का सविस्तार वर्णन किया गया है।

इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासनाका सुन्दर निरूपण किया गया है। अनेक भक्तिपरक आख्यानों एवं स्तोत्रोंका भी इसमें अद्भुत संग्रह है।

विष्णु के अवतार कृष्ण का उल्लेख यद्यपि कई पुराणों में मिलता है, किन्तु इस पुराण में यह विषय भिन्नता लिए हुए है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में कृष्ण को ही ‘परब्रह्म’ माना गया है, जिनकी इच्छा से सृष्टि का जन्म होता है।


संरचना (Structure)             

व्यास जी ने ब्रह्मवैवर्त पुराण के चार भाग किये हैं इन चारों खंडों में दो सौ अठारह अध्याय हैं। जिसमे 18,000 श्लोक है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के चार खंडों इस प्रकार है-

  1. ब्रह्मखण्ड
  2. प्रकृतिखण्ड
  3. श्रीकृष्णजन्मखण्ड और
  4. गणेशखण्ड।

ब्रह्म खण्ड (Brahma Khanda)

यह ब्रह्मवैवर्त पुराण का प्रथम खंड है इस खंड में कृष्ण चरित्र की विविध लीलाओं और सृष्टि क्रम का वर्णन मिलता है। ब्रह्मवैवर्त अनुसार कृष्ण के शरीर से ही समस्त देवी-देवताओं को आविर्भाव हुआ है।

इसी खण्ड में श्रीकृष्ण के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में राधा का आविर्भाव उनके वाम अंग से दिखाया गया है। इस खंड खण्ड में भगवान सूर्य द्वारा संकलित ‘आयुर्वेद संहिता’ का भी उल्लेख मिलता है।

प्रकृति खण्ड (Prakriti khanda)

यह ब्रह्मवैवर्त पुराण का द्वितीय खंड है। इस खंड में प्रकृति खण्ड में विभिन्न देवियों के आविर्भाव और उनकी शक्तियों तथा चरित्रों का सुन्दर विवरण प्राप्त होता है।

इस खण्ड का प्रारम्भ ‘पंचदेवीरूपा प्रकृति’ के वर्णन से होता है। ये पांच रूप – यशदुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री और सावित्री के हैं, जो अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए रूप धारण करती हैं इनके अतिरिक्त सर्वोपरि रासेश्वरी रूप राधा का है। 

राधा-कृष्ण चरित्र और राधा जी की पूजा-अर्चना का संक्षिप्त परिचय इस खण्ड में प्राप्त होता है।

गणपति खण्ड (Ganesha khanda)

यह ब्रह्मवैवर्त पुराण का तृतीय खंड है। इस खंड में में प्रथम पूजनीय गणेश जी के जन्म की कथा और पुण्यक व्रत की महिमा का वर्णन किया गया हैं गणेश जी के चरित्र और लीलाओं का वर्णन भी इस खण्ड में है।

गणेश जी के आठ विघ्ननाशक नामों की सूची इस खण्ड में इस प्रकार दी गई है- विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लंबोदर, एकदंत, शूर्पकर्ण और विनायक। इस खंड में यह कहा गया है कि गणेश जी को तुलसी दल अर्पित करना वर्जित बताया गया है।

इसी खण्ड में ‘सूर्य कवच’ तथा ‘सूर्य स्तोत्र’ का भी वर्णन है। और राज सुचन्द्र के वध के प्रसंग में ‘दशाक्षरी विद्या’ , ‘काली कवच’ और ‘दुर्गा कवच’ का वर्णन भी इसी खण्ड में मिलता है।

श्री कृष्ण जन्म खण्ड (Krishna khanda)

यह ब्रह्मवैवर्त पुराण का चतुर्थ और अंतिम खंड है। यह एक सौ एक अध्यायों में फैला हुआ सबसे बड़ा खण्ड भी है। इस खंड में श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। ‘श्रीमद्भागवत’ में भी इसी प्रकार श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन उपलब्ध होता है।

इस खण्ड में योगनिद्रा द्वारा वर्णित ‘श्रीकृष्ण कवच’ का उल्लेख है जिसके पाठ से दैहिक, दैविक तथा भौतिक भयों का समूल नाश हो जाता है। श्रीकृष्ण के तेंतीस नाम, बलराम के नौ नाम और राधा के सोलह नामों की सूची भी इसी खण्ड में दी गई है।

इसी खण्ड में तिथि विशेष में विभिन्न तीर्थों में स्नान करने और पुण्य लाभ पाने का उल्लेख किया गया है। ‘कार्तिक पूर्णिमा’ में राधा जी की पूजा-अर्चना करने पर बल दिया गया है, जो विशेष फलदायी है।इसी खण्ड में कहा गया है कि ‘अन्नदान’ से बढ़कर कोई दूसरा दान नहीं है।

इस पुराण के अन्य विषयों में पर्वत, नदी, वृक्ष, ग्राम, नगर आदि की उत्पत्ति, मनु-शतरूपा की कथा, ब्रह्मा की पीठ से दरिद्रा का जन्म, मालावती एवं कालपुरुष संवाद, दिनचर्या, श्रीकृष्ण, शिव और ब्रह्माण्ड कवचों का वर्णन, गंगा वर्णन तथा शिव स्तोत्र आदि का उल्लेख भी शामिल है।


कथा एवं विस्तार (History Story of Brahma Vaivarta Purana in Hindi)

ब्रह्मवैवर्त पुराण कहता है कि सृष्टि में असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के अपने-अपने ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। और इन सभी ब्रह्माण्डों से भी ऊपर स्थित गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण निवास करते हैं।

सृष्टि निर्माण के उपरान्त सर्वप्रथम श्री कृष्ण के अर्द्ध वाम अंग से अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में राधा प्रकट हुईं। कृष्ण से ही ब्रह्मा, विष्णु, नारायण, धर्म, काल, महेश और प्रकृति की उत्पत्ति बतायी गयी है, फिर नारायण का प्राकट्य कृष्ण के दाये अंग से और पंचमुखी शिव का प्राकट्य कृष्ण के वाम पार्श्व से हुआ।

नाभि से ब्रह्मा, वक्षस्थल से धर्म, वाम पार्श्व से पुन: लक्ष्मी, मुख से सरस्वती और विभिन्न अंगों से दुर्गा, सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, वरुण, वायु आदि देवी-देवताओं का आविर्भाव हुआ।


ब्रह्मवैवर्त पुराण का महत्व (Importance of Brahma Vaivarta Purana hindi)

ब्रह्मवैवर्त पुराण एक वैष्णव पुराण है, इस पुराण में कृष्ण को ही ‘परब्रह्म’ माना गया है, जिनकी इच्छा से सृष्टि का जन्म होता है।

इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासनाका सुन्दर निरूपण किया गया है। अनेक भक्तिपरक आख्यानों एवं स्तोत्रोंका भी इसमें अद्भुत संग्रह है।

यद्यपि विष्णु के अवतार श्री कृष्ण का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है, किन्तु इस पुराण में यह विषय भिन्नता लिए हुए है। ‘भागवत पुराण’ का वर्णन साहित्यिक और सात्विक है जबकि ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ का वर्णन श्रृंगार रस से परिपूर्ण है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण का आध्यात्मिक महत्व होने के साथ साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्व है। क्योंकि ब्रह्मवैवर्त पुराण में जीव की उत्पत्ति के कारण और ब्रह्माजी द्वारा समस्त भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले जीवों के जन्म और उनके पालन पोषण का सविस्तार वर्णन किया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण कहता है कि सृष्टि में असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, इस बात की पुष्टि अब वैज्ञानिक भी करते है।

Editor- Gvat


Last Updated on 31/12/2020