चैत्र नवरात्रि व्रत, मुहूर्त और पूजा विधि

हिन्दु धर्म में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है। यह चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से नवमी तिथि तक होता है। इंग्लिश कलेंडर अनुसार यह प्रत्येक वर्ष (मार्च अप्रेल के महीने) में पड़ता है।

इन नौ दिनों में नवरात्रि में दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-आराधना की जाती है।


चैत्र नवरात्र व्रत कथा और महत्व (Importance of chaitra Navratra)

नवरात्रि का त्योहार वर्षभर में दो बार मनाया जाता है। चैत्र माह में आने वाली नवरात्रि को चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु में आने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहते है।

धार्मिक मान्यता अनुसार जो व्यक्ति मां दुर्गा की पूजा आराधना सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से करता है उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

हिंदु पंचांग के अनुसार चैत्र महीने से नया साल शुरू होता है, इसलिए कोई भी नया शुभ कार्य करने के लिए नवरात्रि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

प्रतिपदा से राम नवमी तक इस पर्व को मनाया जाता है। इस त्योहार को वसंत नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) करते है।

इसके बाद प्रतिदिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूप (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि) की पूजा की जाती है। कोई पूरे नौ दिन व्रत रखता है तो कोई प्रथम और अंतिम दिन।

2021 में चैत्र नवरात्रि कब है? (Chaitra Navratri Date & Muhurat)

इस साल यानी कि साल 2021 में चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से 21 अप्रैल तक है। 

दिनांकतिथिसमयव्रत
13 अप्रैल प्रतिपदाप्रातः 10:18 तककलश स्थापना, शैलपुत्री पूजन
14 अप्रैलद्वितीयदोपहर 12:47 तकब्रह्मचारिणी पूजन
15 अप्रैलतृतीयदोपहर 3:27 तकचन्द्रघन्टा
16 अप्रैलचतुर्थसायं 6:5 तककुष्मांडा
17 अप्रैलपंचमीरात्रि 8:32 तकस्कंदमाता
18 अप्रैलषष्ठीरात्रि 10:34 तक कात्यायनी
19 अप्रैलसप्तमीरात्रि 12:1 तककालरात्रि
20 अप्रैलअष्टमीरात्रि 12:43 तकदुर्गाष्टमी
21अप्रैलनवमीरात्रि 12:35 तकसिद्धिदात्री, नवरात्रि समाप्त, रामनवमी

चैत्र नवरात्रि कलश स्थापना (kalash Sthapna Muhurat in Hindi)


तिथि- 13 अप्रैल 2021 (मंगलवार)
शुभ मुहूर्त- सुबह 05: 28 से 10:14 मिनट तक।
अवधि- 04 घंटे 15 मिनट।
दूसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 11: 56 से दोपहर 12:47 मिनट तक।


चैत्र नवरात्रि पूजन विधि

चैत्र नवरात्र की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रातः काल स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पाद्य, लाल वस्त्र, अक्षत, पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य, पुष्प और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं लेकर मां का श्रृंगार और पूजन करें।

कलश स्थापना कैसे करें?

गणपति पूजन के बाद कलश की स्थापना करें। कलश स्थापना निम्न प्रकार करें-

सर्वप्रथम मंदिर में एक लाल कपड़ा बिछाएं। इस कपड़े पर थोड़े चावल रख एक मिट्टी के पात्र में जौ बो दें। इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। कलश पर स्वास्तिक बना उस पर कलावा बांधें।

कलश में साबुत सुपारी, सिक्का और अक्षत डालकर उसके ऊपर अशोक के पत्ते रखें। अब एक नारियल को लाल चुनरी से लपेटकर कलावा से बांध दें। इस नारियल को कलश के ऊपर पर रख दें। इसके बाद दीप आदि जलाकर कलश की पूजा करें। कलश की रोज पूजा करनी चाहिए और नौ दिनों बाद इसे उठाया जाता है। 


इस वर्ष घोड़े पर सवार होकर आएंगी माँ

माना जाता है कि माँ भगवती की सवारी सिंह (शेर) है। लेकिन हर साल नवरात्रि के दौरान माता किसी अलग सवारी पर आती हैं। माता की अलग-अलग सवारियों का देश पर और देश के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

माता की सवारी उनके आगमन यानी कि नवरात्रि के प्रथम दिन से निर्धारित होती है।

शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।
गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ 

यदि प्रतिपदा सोमवार या रविवार को पड़ता है तो माता हाथी पर सवार होकर आती है। अगर शनिवार या मंगलवार पड़ता हैं तो माता घोड़े पर सवार होती है। यदि गुरुवार या शुक्रवार के दिन हो रहा है तो डोली पर सवार है और यदि बुधवार के दिन नवरात्रि की पहली तिथि पड़ती है तो माता नाव पर सवार हैं, ऐसा जानना चाहिए।

माता अगर हाथी से आती हैं तो देश में ज्यादा बारिश होती है। यदि वे घोड़े से आएं तो युद्ध की स्थिति बनती है। अगर डोली से आती हैं तो देश के लोगों के अंदर किसी महामारी का भय पनपता है। वहीं अगर माता नाव से आती हैं तो मानव का कल्याण होता है।


Last Updated on 06/04/2021

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