नित्य-कर्म (हिन्दू द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले कर्म)

हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) में नित्य कर्म की क्या विधि है? नित्य उपासना कैसे करें? बिस्तर त्यागने के बाद से क्या क्या कर्म करना चाहिए आदि ढेरों प्रश्न जिज्ञासुओं के मन में आते है। इन सभी प्रश्नों का उत्तर इस लेख में देने का प्रयास किया गया है।


हिन्दू द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले कर्म

हिन्दू मान्यता अनुसार जन्म लेते ही मनुष्य तीन ऋणों वाला हो जाता है, यह तीन ऋण ‘देव ऋण, पित्र ऋण और मनुष्य ऋण‘ हैं। इन ऋणों से मुक्त होने के लिए नित्य कर्म आवश्यक है। नित्यकर्म में शारीरिक शुद्धि, सध्यावन्दन, तर्पण और देव-पूजन प्रभृति शास्त्रनिर्दिष्ट कर्म आते हैं। इनमे मुख्य रूप से 6 कर्म बताये गए है।

संध्या स्नानं जपश्चैव देवतानां च पूजनम् ।
वैश्वदेवं तथाऽतिथ्यं षट् कर्माणि दिने दिने।।

अर्थात:- मनुष्य को स्नान, जप, देवपूजन, बलिवैश्वदेव और अतिथि सत्कार- ये छः कर्म प्रतिदिन करने चाहिए।

अपने नित्य कर्म हमें शास्त्र-निर्दिष्ट पद्धति से करना ही लाभकारी होता है, क्योंकि तभी मनुष्य अग्रिम षट्-कर्म का अधिकारी बनता है। अब हम बिस्तर त्यागने के पश्चात किए जाने वाले षट् कर्म (6 कर्म) बताते है, जो प्रत्येक सनातनी को अवश्य करना चाहिए-


1. ब्रह्म मुहूर्त में जागना (Waking up in dawn)

सूर्योदय से चार घड़ी पूर्व (डेढ़ घंटे) का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है, यह बड़ा सुनहरा समय है। क्योंकि जब तक सूर्योदय नहीं होता है, तब तक माया सोई और वातावरण शांत रहता है।

इसी समय योगी को योग का, विद्यार्थी को विधा का औऱ संगीतज्ञ को संगीत का अभ्यास करना चाहिए। ब्रह्म-मुहूर्त में शैय्या छोड़कर अपने नित्य कर्म में जुट जाने वाले मनुष्य स्वस्थ और प्रसन्नचित रहते हैं।


2. करावलोकन (See Your Palms)

आंख खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए निम्न श्लोक का उच्चारण करना उत्तम रहता है-

कराग्रे वसते लक्ष्मीः कर मध्ये सरस्वती।
करमूल स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते करदर्शनम् ।।

अर्थ:- हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और हाथ के मूल भाग में ब्रह्माजी निवास करते हैं। अतः उठते ही हाथों का अवलोकन करें।


3. भूमि वंदना (Prayer of the earth)

करावलोकन के पश्चात पृथ्वीपर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करे और उन पर पैर रखने के विवशता के लिये उनसे क्षमा मांगते हुए निम्न श्लोक का पाठ करे।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शक्षमस्व मे।।

अर्थ:- ‘समुंद्ररूपी’ वस्त्रो को धारण करनेनाली, पर्वतरूपस्तनोंसे मंडित भगवान् विष्णुकी पत्नी पृथ्वीदेवि ! आप मेरे पाद-स्पर्श (पैर रखने) को क्षमा करें।


4. मंगल दर्शन (Mangal Darshan)

शुभ वस्तु को देखने से दिन अच्छा गुजरता है, इसलिए मंगल दर्शन किया जाता है। धरती पर पैर रखने के बाद गोरोचन, चन्दन, सुवर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण, मणि आदि मांगलिक वस्तुओं के दर्शन कर गुरु, अग्नि और सूर्य को नमस्कार करें।


5. अभिवादन (Addressing)

मुंह, हाथ-पैर धोकर कुल्ला एवं स्नान आदि से निवृत होकर माता-पिता, गुरु का अभिवादन करें। यदि पास मौजूद न हो तो मानसिक रूप से भी किया जा सकता है।

इसके बाद पूजन कक्ष में चले जाएं। औऱ आसान आदि बिछाकर आचमन करें। आचमन करने की विधि निम्न है-

हथेलियों को मोड़कर गाय के कान जैसा बना लें कनिष्ठा व अंगुष्ठ को अलग रखें। तत्पश्चात जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए जल ग्रहण करें- 

  1. केशवाय नम: 
  2. ॐ नाराणाय नम:
  3. ॐ माधवाय नम:ॐ

अब ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछते हुए हाथ धो लें। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है।

शास्त्र अनुसार- ‘आचमन करने से व्यक्ति पवित्र हो जाता है, और आचमन न करने पर समस्त कृत्य व्यर्थ है।’


6. कर्म एवं उपासना (Duty and Workship)

इसके बाद आप अपनी-अपनी पद्धति और क्षमता अनुसा क्रमशः (गणेश, विष्णु, शिव, देवी एवं सूर्य, इष्ट आदि) की उपासना कर सकते है अथवा प्रातः स्मरणीय श्लोक का पाठ भी कर सकते है।

इसके पश्चात भगवान से प्रार्थना करें कि ‘हे परमात्मा आपकी आज्ञाओं का पालन करते हुए आज मैं जो कर्म करूं, वह सम्पूर्ण हो।


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Last Updated on 12/03/2021