पुराण

सनातन धर्म में पुराणों का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है, पुराणों की कुल संख्‍या 18 मानी गयी है। और इन अठारह पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कर्म-अकर्म की गाथाएँ कही गयी हैं।

सरल शब्दो में- “पुराण वेदों का विस्तार हैं। वेद बहुत ही जटिल तथा शुष्क भाषा-शैली में लिखे गए हैं। वेदों की जटिल भाषा में कही गई बातों को पुराणों में सरल भाषा में समझाया गया हैं।”

Purana is a Sanskrit word that means “ancient” or “old.” It is a genre of ancient Indian literature found both in Hinduism and Jainism.


पुराण का इतिहास (History of puran)

पुराण की रचना का समय ज्ञात नही है। और न ही इसके रचियता के संबंध में दृढ़ता पूर्वक कहा जा सकता है। एक मान्यता अनुसार- पुराण की प्रथम रचना ब्रह्मा ने देव वाणी संस्कृत में की थी, और इसमे कुल 4 अरब श्लोक थे।

जो ब्रह्मा से उनके पुत्रो को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात गुरु शिष्य परम्परा से सहसत्रों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढी चलता रहा लेकिन इतना बड़ा ग्रंथ होने के कारण इसको समझना अत्यंत दुष्कर था। इसलिए इसे महर्षि वेदव्यास ने पुराणो को 18 भाग में विभाजित कर दिया, और उसमे कुल श्लोको की संख्या 3 करोड़ थी।

पुराणों की विषय-वस्तु में असमानता भी देखने को मिलती है। इतना ही नहीं, एक ही पुराण के कई-कई पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं जो परस्पर भिन्न हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी रचना कई रचनाकारों ने कई शताब्दियों में की है। फिर भी पुराण अनादि काल से प्रचलन में रहा है और इसके लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आयी है।  

प्रसिद्ध इतिहासकार मैक्स मूलर और रोनाल्ड इंडेन के अनुसार इतिहास में पुराणों के अंदर काफी कुछ बदला और जोड़ा गया है, और इसका वैदिक युग या वैदिक साहित्य से बहुत कम संबंध है।


पुराण का अर्थ (Meaning of puran)

‘पुराण’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘प्राचीन आख्यान’ या ‘पुरानी कथा’। ‘पुरा’ शब्द का अर्थ है – अनागत एवं अतीत। ‘अण’ शब्द का अर्थ होता है – कहना या बतलाना। रघुवंश में पुराण शब्द का अर्थ “पुराण पत्रापग मागन्नतरम्” एवं वैदिक वाङ्मय में “प्राचीन: वृत्तान्त:” दिया गया है।

सांस्कृतिक अर्थ से हिन्दू संस्कृति के वे विशिष्ट धर्मग्रंथ जिनमें सृष्टि से लेकर प्रलय तक का बखान किया गया हो, पुराण कहलाते है। पुराण की मूल रचना संस्कृत में थी, मगर समय के साथ यह कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी रचे गए हैं।

पुराण के विषयों की कोई सीमा नहीं है, इसमें ब्रह्मांडविध्या, देवी-देवता, राजा, नायक, ऋषि-मुनि, लोककथाएँ, तीर्थ, चिकित्सा, खगोल शास्त्र, व्याकरण, खनिज विज्ञान, मंत्र हास्य, प्रेमकथाओं के साथ-साथ धर्मशास्त्र और दर्शन का भी वर्णन है।

जैन धर्म में भी पुराणों का जिक्र मिलता है, हिंदुओं के विपरीत जैन पुराणों का रचनाकाल और रचनाकारों के नाम भी बताये जा सकते हैं।


पुराणों की संख्या (Types of Purans)

पुराणों की कुल संख्या अठारह मानी गयी है। पुराणों में एक विचित्र बात यह है कि प्रायः प्रत्येक पुराण में अठारहों पुराणों के नाम और उनकी श्लोक-संख्या का उल्लेख किया गया है।

‘विष्णुपुराण’ के अनुसार अठारह पुराणों के नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शैव (वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड।

अन्य पुराणों में भी ‘शैव’ और ‘वायु’ का भेद छोड़कर नाम प्रायः सब जगह समान हैं, श्लोक-संख्या में कहीं-कहीं कुछ भिन्नता है। नारद पुराण, मत्स्य पुराण और देवीभागवत में ‘शिव पुराण’ के स्थान में ‘वायुपुराण’ का नाम है।

नाम के निर्धारण को लेकर एक अन्य समस्या यह भी है कि वर्तमान में भागवत के नाम से दो पुराण हैं— एक ‘श्रीमद्भागवत’, दूसरा ‘देवीभागवत’। इन दोनों में कौन वास्तव में महापुराण है, इसपर विवाद रहा है।

बहुमत से अठारह पुराणों के नाम इस प्रकार हैं:

  1. ब्रह्म पुराण
  2. पदम पुराण
  3. विष्णु पुराण (उत्तर भाग विष्णुधर्मोत्तर)
  4. वायु पुराण (भिन्न मत से शिव पुराण)
  5. भागवत पुराण (भिन्न मत से देवी भागवत)
  6. नारद पुराण
  7. मार्कण्डेय पुराण
  8. अग्नि पुराण
  9. भविष्य पुराण
  10. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  11. लिंग पुराण
  12. वाराह पुराण
  13. स्कन्द पुराण
  14. वामन पुराण
  15. कूर्म पुराण
  16. मत्स्य पुराण
  17. गरुण पुराण
  18. ब्रह्माण्ड पुराण

पुराण के लक्षण (significant of purans)

अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पांच लक्षण माने गये हैं : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चंद्रादि वंशीय चरित)।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥

(१) सर्ग – पंचमहाभूत, इंद्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन।

(२) प्रतिसर्ग – ब्रह्मादिस्थावरांत संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन।

(३) वंश – सूर्यचंद्रादि वंशों का वर्णन।

(४) मन्वन्तर – मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इंद्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन।

(५) वंशानुचरित – प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन।


पुराण का महत्व (Impotence of puran)

पुराण प्राचीनकाल से ही मनुष्यों का मार्गदर्शन करते आये हैं। पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कर्म-अकर्म की गाथाएँ कही गयी हैं। जो मनुष्य को धर्म एवं नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देते हैं। पुराण मनुष्य के कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें दुष्कर्म करने से रोकते हैं।


Last Updated on 22/04/2021