इस्लाम (Islam)

इस्लाम (Islam) मुस्लिम लोगों का धर्म है। ‘इस्लाम’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘शांति में प्रवेश करना’। इस्लाम के अन्य अर्थ परित्याग, विसर्जन या आज्ञाकारिता भी हैं। मुसलिम या मुसलमान वह है जो परमात्मा और मनुष्य के साथ पूर्ण शांति का संबंध रखता है।

अत: इस्लाम का लाक्षणिक अर्थ होगा- “वह धर्म जिसके द्वारा मनुष्य अल्लाह (भगवान) की शरण लेता है तथा अन्य मनुष्यों से अहिंसा एवं प्रेम का बर्ताव करता है।”


इस्लाम धर्म की स्थापना और विकास

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब (Hazrat Muhammad Sahab) थे, जिनका जन्म अरब देश के मक्का शहर में 570 ई. में हुआ था। इस्लाम धर्म के मूल ग्रंथ ‘कुरआन’, ‘सुन्नत और ‘हदीस’ हैं। ‘कुरआन’ वह ग्रंथ है जिसमें मुहम्मद साहब के पास अल्लाह द्वारा भेजे गए संदेश संकलित हैं। ‘सुन्नत’ में मुहम्मद साहब के कृत्यों का उल्लेख है और ‘हदीस’ में उनके द्वारा दिए गए आदेशों का संग्रहण है।

मुहम्मद साहब तेरह वर्ष मक्का में तथा दस वर्ष मदीना में रहे। मुहम्मद साहब को जब धर्म का इलहाम हुआ तो लोग उन्हें पैगंबर, नबी और रसूल कहने लगे। पैगंबर का अर्थ पैगाम (संदेश) ले जाने वाला होता है। नबी का अर्थ होता है किसी परम ज्ञान की घोषणा करना, जबकि रसूल का अर्थ दूत होता है। मुहम्मद साहब रसूल हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और मनुष्यों के बीच दूत का काम किया। मुसलमानों के अनुसार, पैगंबरों की संख्या एक लाख चौबीस हजार है। इस्लाम का मूल मंत्र है-


“ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह”

अर्थात् अल्लाह के सिवाय और कोई पूजनीय नहीं होता है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।


इस्लाम के 5 अरकान (स्तंभ)

‘कुरआन’ द्वारा हर मुसलमान को पाँच धार्मिक कृत्य करने का आदेश है-

  1. कलमा पढ़ना : ला इलाइल्लिलाह का पारायण करना।
  2. नमाज पढ़ना : अल्लाह से दिन में पाँच बार प्रार्थना करना।
  3. रोजा रखना : रमजान के महीने में सिर्फ एक बार सूर्यास्त के बाद भोजन करना।
  4. जकात : अपनी आय का चालीसवाँ हिस्सा दान में देना।
  5. हज : मक्का-मदीना की तीर्थयात्रा करना।

‘कुरआन’ में इस बात पर बल दिया गया है कि ईश्वर एक है तथा उसके अलावा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। कुरआन देवयोनि को भी मानता है और उसमें उन्हें ‘ मलक’ या ‘फरिश्ता’ कहा गया है। मुसलमानों को शैतान में विश्वास न करने का आदेश है। कुरआन एक जन्म में विश्वास करता है; किंतु मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता कब्र में पहुँचने के बाद मनुष्य का दूसरा जीवन शुरू होता है। कुरआन में कयामत-कल्पांत या महाप्रलय-का विशद वर्णन है। कुरआन में स्वर्ग-नरक की भी कल्पना है फातिहा कर्मफल का भी वर्णन है।

इस्लाम धर्म के मूल हैं- नमाज, रोजा, जकात, हज तथा जिहाद। जिहाद धर्मयुद्ध का द्योतक है। इस्लाम के प्रचार के लिए जो लड़ाइयाँ लड़ी गईं उन्हें पवित्र और उचित ठहराने के लिए ‘जिहाद’ शब्द का प्रचलन हुआ। हदीस हज की गिनती जिहाद में करता है। लेकिन दुर्भाग्यवश बाद में जबरन और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार हुआ। गैर मुसलिमों पर जजिया कर लगाया गया उन्हें ‘काफिर’ कहा गया। लगभग 715 ई. तक इसलाम का काफी विस्तार हो चुका था।


शिया और सुन्नी (Differences between Sunni and Shia In Hindi) 

मुसलमान मुख्य रूप से दो समुदायों में बंटे हैं- शिया और सुन्नी। यूं तो शिया और सुन्नी दोनों ही कुरान और प्रोफेट मोहम्मद में विश्वास रखते हैं. और दोनों ही इस्लाम की अधिकतर बातों पर सहमत भी रहते हैं।

फिर भी दोनों में फर्क इतिहास, विचारधारा और लीडरशिप से जुड़ा है. दोनों के बीच झगड़े की शुरुआत हुई 632 ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद इस्लाम के उत्तराधिकारी पद को लेकर हुई थी। प्रसंग कुछ इस प्रकार है-

इस्लामी धर्मराज्य के पहले नेता या खलीफा स्वयं मुहम्मद साहब हुए। मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उनकी गद्दी उनके चचेरे भाई और दामाद हजरत अली को मिलनी चाहिए। क्योंकि पैगंबर ने अली को मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक और धार्मिक लीडर के तौर पर चुना था, ऐसा एक पक्ष का कहना था।

जबकी दूसरे पक्ष मानना था कि मुहम्मद साहब ने सिर्फ़ हज़रत अली का ध्यान रखने को कहा है और असली वारिस अबू बकर को होना चाहिए। जो लोग अली के उत्तराधिकार के समर्थक थे उन्हें ‘शिया’ कहा गया जबकि अबू बकर के समर्थकों को ‘सुन्नी‘ कहा गया। 

ध्यान दें कि वास्तव में अबु बकर को ख़लीफ़ा बनाया गय़ा और इसके दो ख़लीफ़ाओं के बाद ही अली को ख़लीफ़ा बनाया गया। इससे दोनों पक्षों में लड़ाई जारी रही। दूसरे, तीसरे और चौथे ख़लीफ़ाओं की हत्या कर दी गई थी- इन खलीफ़ाओं के नाम हैं उमर, उस्मान और अली था।

इसलिए शिया मुसलमान मुहम्मद के बाद के तीन खलीफाओं को नहीं मानते, किंतु सुन्नी लोग उन्हें मान्यता देते हैं।

सुन्नी और शिया शब्द का क्या अर्थ है?

इस्लामी इतिहास में शिया एक राजनीतिक समूह के रूप में थे- ‘शियत अली’ यानी अली की पार्टी।

सुन्नी शब्द ‘अहल अल-सुन्ना’ से बना है जिसका मतलब है परम्परा को मानने वाले लोग. इस मामले में परम्परा का संदर्भ ऐसी रिवाजों से है जो पैग़ंबर मोहम्मद और उनके क़रीबियों के व्यवहार या दृष्टांत पर आधारित हो।


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Last Updated on 26/12/2020