महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन

महाकाल या महाकालेश्वर मंदिर (Mahakaleshwar Jyotirlinga) भारत के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर मे स्थित है, जो भारत की राजधानी दिल्ली से 782 किमी दूर स्थित है। महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है।

उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है। इस नगरी का पौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। उज्जैन को राजा विक्रमादित्य के कारण भी जाना जाता है। श्री कृष्ण ने भी उज्जैन में ही शिक्षा अर्जित की थी।


Mahakaleshwar Jyotirlinga Complete Guide In Hindi

Mahakaleshwar Jyotirlinga
Nameमहाकालेश्वर, महाकाल
Locationउज्जैन (मध्य प्रदेश)
Typeहिन्दू मंदिर
Statusज्योतिर्लिंग
Dedicated toभगवान शिव
Timings04:00 AM to 11.00 PM
Aarti Timing भस्म आरती: 4.00 AM
प्रातः आरती: 7 AM
संध्या आरती: 7 PM
शयन आरती: 11 PM
Entry Feeकोई शुल्क नही
Cameras, Mobile Phonesअनुमति नही
Distance from Transportation Hubsउज्जैन रेलवे स्टेशन (2.4 km);
इंदौर हवाई अड्डा (53 km)
Origins of the Templeस्वयम्भू; (अति प्राचीन काल)
Current Structure Constructed in18वीं सदी चौथा दशक
Current Structure Constructed byजीर्णोद्धारक: उज्जैन शासक/मराठा+राजा भोज
Architectural Styleभारतीय मंदिर शैली
Websiteमहाकालेश्वर मंदिर

महात्म्य (Greatness)


पौराणिक मान्यता अनुसार- “
जहाँ महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है, अर्थात केंद्र है।”
         “नाभिदेशे महाकालोस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:।”

आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।
          आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।
          भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते॥


पुरानों, महाभारत और कालीदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का बखान किया गया है। कालीदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में भी इस मंदिर का मनोहर वर्णन है।


महाकाल ज्योतिर्लिंग कथा (Story of Mahakaleshwar Jyotirlinga)

एक समय उज्जैन शहर में चंद्रसेन नामके राजा रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा औऱ परम शिव भक्त थे। वे एक बार भगवान शिव के ध्यान में मग्न थे। जब राजा चंद्रसेन बाबा महाकाल के समाधिस्थ में थे, तो उस समय वहां एक विधवा गोपी अपने 5 साल के छोटे बालक के साथ दर्शन के लिए आई।

राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव पूजा करने के लिए प्रेरित हो गया। वह कहीं से पत्थर ले आया और अपने घर में एकांत स्थल में बैठकर भक्तिभाव से शिवलिंग की पूजा करने लगा।

वह शिव भक्ति में इतना खो गया कि भोजन आदि की सुध न रही। तब दुखी होकर उसकी मां ने वह पत्थर उठाकर बाहर फेंक दिया। उस पर बालक जोर-जोर से रोकर भगवान शिव को पुकारने लगा। फिर बेहोश हो गया।

भगवान शिव उसकी भक्ति से अति प्रसन्न हो उठे थे। कुछ देर बाद बालक को ज्यों ही होश आया तो उसने अपने सामने एक अति भव्य मंदिर था। बालक भाव विभोर होकर भगवान शिव की स्तुति करने लगा।

मां को जब यह समाचार मिला तो वह भी दौड़ी-दौड़ी वहां आई और अपने लाल को सीने से लगा लिया। राजा चन्द्रसेन को जब यह खबर मिली तो वह भी भक्त बालक को देखने अपने अनुचरों सहित वहां पधारे। देखते ही देखते है। वहां बहुत से लोगों की भीड़ लग गई।

तभी वहां रुद्रावतार हनुमानजी प्रगट हुए और बोले रहे * -“हे मनुष्यो! भगवान शंकर की भक्ति शीघ्र फल देने वाली है। इस बालक की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहाँ लिंग रूप में विराजमान हुए है।

यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इसे लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा।इसी के वंश का आठवां पुरुष महायशस्वी नंद होगा, जिसके पुत्र के रूप में स्वंय नारायण कृष्ण नाम से प्रतिष्ठित होंगे।


महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास (History of Mahakaleshwar Temple)

शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई थी। इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में उजैन की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी।

लेकिन 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन 1731 से 1809 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही।

मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं – पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।


मंदिर परिसर और वास्तुकला (Temple Complex and Structure)

मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग (Omkaleshwar Shivling) स्थापित है। मंदिर का क्षेत्रफल 10.77 × 10.77 वर्गमीटर और ऊंचाई 28.71 मीटर है।

महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी।

महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है। हाल ही में इसके 118 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है


महाकालेश्वर मंदिर समय सूची (Mahakaleshwar Temple Opning & Aarti Timing)

चैत्र से आश्विन तककार्तिक से फाल्गुन तक
भस्मार्ती प्रात: 4 बजेभस्मार्ती प्रात: 4 बजे
प्रात: आरती 7 से 7-30 तकप्रात: आरती 7-30 से 8 तक
महाभोग प्रात: 10 से 10-30 तकमहाभोग प्रात: 10:30-11:00 तक
संध्या आरती 5 से 5-30 तकसंध्या आरती 5-30 से 6 तक
आरती श्री महाकालेश्वर संध्या: 7 से 7-30 तकआरती श्री महाकालेश्वर संध्या: 7-30 से 8 तक
शयन आरती रात्रि 11:00 बजेशयन आरती रात्रि 11:00 बजे

महाकाल ज्योतिर्लिंग लाइव दर्शन ( Ujjain Mahakal Darshan LIVE)


कैसे पहुंचे (How to Reach Mahakaleshwar Temple)

वायुमार्ग (By Air) :  उज्जैन में कोई एयरपोर्ट नहीं है। इसका सबसे नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर का ‘अहिलाबाई होलकर इंटरनेशल’ एयरपोर्ट है, जो मंदिर से 53 Km. दूर अवस्थित है। यहां से उज्जैन जाने के लिए बस अथवा टेक्सी उपलब्ध है।

रेल मार्ग (By Rail): उज्जैन रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी मात्र 2.4 km. है। उज्जैन लगभग देश के हर बड़े रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।

सड़क By Road): उज्जैन में सड़को का अच्छा जाल बिछा है और यह देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। नैशनल हाइवे 48 और नैशनल हाइवे 52 इसे देश के प्रमुख शहरों से जोड़ते हैं।


कहां ठहरे (Where to Stay)

मंदिर के पास आपको 700-1500 रुपए में होटल किराए पर मिल जाएगा। अगर आप भस्म आरती देखना चाहते है तो आपको मंदिर के पास किसी होटल का चुनाव करना चाहिए। क्योंकि भस्म आरती के लिए रात को 1 बजे से लाइन लगने लगती है।।


उज्जैन के अन्य तीर्थ स्थल

उज्जैन का प्राचीनकाल काल से ही पौराणिक और धार्मिक महत्व रहा है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन सप्तपुरियों में से एक भी है, आधार पर उज्जैन का धार्मिक महत्व अतिविशिष्ट है। उज्जैन शहर के प्रमुख मंदिर निम्न है-

कालभैरव मंदिर, उजैन (Shri Kaal Bhairav Temple, Bhairav Garh)

काल भैरव मंदिर, भगवान काल भैरव को समर्पित है। यह महाकाल मंदिर से लगभग पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

यह दुनिया का एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां पर भैरव भगवान पर मदिरा (शराब) का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। कालभैरव की प्रतिमा मदिरा (शराब) का सेवन करती है मदिरा कहां जाता है ये रहस्य आज भी बना हुआ है।

हरसिद्धि मंदिर (Harsiddhi Temple)

हरसिद्धि मंदिर उज्जयिनी के मुख्य मंदिरों में एक है। यह के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी।

मंदिर प्रांगण में 51 फीट ऊंचे 2 स्तंभ हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। दोनों दीप स्तंभों को जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी।

वेद्शाला (Vaidhshala Ujjain)

उज्जैन शहर में दक्षिण की ओर क्षिप्रा के दाहिनी तरफ जयसिंहपुर नामक स्थान में बना यह प्रेक्षा गृह “जंतर महल’ के नाम से जाना जाता है। इसे जयपुर के महाराजा जयसिंह ने सन् 1725 ई से 1730 ई के मध्यकिया गया था।

राजा जयसिंह ने इसी प्रकार की चार अन्य वेधशालाओं का निर्माण दिल्ली, जयपुर, मथुरा तथा वाराणसी में भी करवाया था। भूगोलवेत्ता यह मानते आये हैं कि देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है।

इस वेधशाला में सम्राट्-यन्त्र, नाडीवलय-यन्त्र, दिगंश-यन्त्र तथा याम्योतर भित्तिा-यन्त्र प्रमुख उपकरण हैं। इन यन्त्रों से ग्रह नक्षन्त्रों के वृत्ता एवम्संक्रमण का अध्ययन किया जाता रहा हैं। शिक्षा विभाग के अन्तर्गत इस वेधशाला में ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन आज भी किया जाता हैं।

महर्षि सांदीपनि आश्रम (जहां कृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की थी)

संदीपनी आश्रम महाकालेश्वर मंदिर से दो किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। इस जगह का पौराणिक महत्व है। यही पर भगवान श्रीकृष्ण,उनके भाई बलराम और उनके सखा ने शिक्षा ग्रहण की थी। इस बात का उल्लेख महाभारत, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में मिलता हैं।

इस क्षेत्र में पुरातात्विक प्रमाण के रूप में तीन हजार वर्ष पुराने चित्रित धूसर पात्र मिले हैं, जिनका सम्बन्धे महाभारत काल से माना जा सकता हैं. ये पात्र हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली), मथुरा, अहिच्छत्रा और कौशाम्बी से प्राप्त अवयोषों से मिलते-जुलते हैं।

सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में इस आश्रम के पास श्री वल्लभाचार्य ने धार्मिक प्रवचन किया थ।. उस स्थान पर आचार्यजी द्वारा लगाया हुआ पीपल का वृक्ष है

चिंतामणि गणेश (Chintamani Ganesh)

चिंतामणि गणेश मंदिर (Chintamani Ganesh Temple) महाकालेश्वर मंदिर से 6 किलोमीटर की दूरी स्थित है। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी।

गणेश जी के इस प्रसिद्ध मंदिर के गर्भगृह में पार्वतीनंदन तीन रूपों में विराजमान हैं। पहला चिंतामण, दूसरा इच्छामन और तीसरा सिद्धिविनायक। गौरीसुत गणेश की तीनों प्रतिमाएं गर्भगृह में प्रवेश करते ही दिखाई देती हैं।

यहां दर्शन करने वाले व्यक्ति की सभी चिंताएं खत्म हो जाती है और वे चिंता मुक्त हो जाते हैं। बुधवार के दिन यहां श्रृद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

त्रिवेणी नवग्रह मंदिर उज्जैन (Triveni Navgrah Temple)

यह मंदिर मुख्य शहर से केवल 6 कि.मी. दूर शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर स्थित यह मंदिर नौ ग्रहों को समर्पित है। शनिचरी अमावस्या पर नवग्रह मन्दिर पर बडी संख्या में लोग एकत्र होते है. इस स्थान का धार्मिक महत्व वर्तमान युग में बढता गया है, यद्यपि पुरातन सन्दर्भो में इस स्थान का विषेश उल्लेख प्राप्त नहीं होता. 

मंगलनाथ (MangalNath)

मंगल पूराण के अनुसार यह मंगल ग्रह का जन्मस्थान है. मन्दिर के सामने बहती शिप्रा नदी का दृश्य अत्यन्त मनमोहक है. दर्शनार्थी विशेषकर मंगलवार को यहाँ बडी संख्या में लोग एकत्र होते है।

ज्योतिष विद्या के अध्ययन के लिए उज्जैन महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है. मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए परम्परा से प्रसिद्ध इस स्थान का धार्मिक महत्व आज भी जन-भावना में सुरक्षित है. इस मन्दिर में महादेव की पूजा होती है 

सिद्धवट (SiddhiWat)

उज्जैन का सिध्दवट प्रयत्न के अक्षयवट, वृन्दावन के वंशीवट तथा नासिक के पंचवट के समान अपनी पवित्रता के लिए प्रसिध्द है. पुण्यसलिला शिप्रा के सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है. स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है. एक मान्यता के अनुसार पार्वती ने यहाँ तपस्या की थी. वह नाथ सम्प्रदाय का भी पूजा स्थान है. सिध्दवट के तट पर शिप्रा में अनेक कछुए पाए जाते है।

उज्जयिनी के प्राचीनसिक्कों पर नदी के साथ कूर्म भी अंकित पाए गए है. इससे भी यह प्रमाणित होता है कि यहाँ कछूए अति प्राचीनकाल से ही मिलते रहे होंगे. कहा जाता है कि कभी इस वट को कटवाकर इस पर लोहे के तवे जड दिए गए थे, परन्जु यह वृक्ष तवों को फोडकर पुन: हरा-भरा हो गया. 

गोपाल मंदिर (Gopal Temple)

महाराजा दौलतराव शिन्दे की धर्मपत्नी बायजाबाई शिन्दे ने अपने आराध्य देव गोपाल कृष्ण का यह मन्दिर उन्नीसवीं शताब्दी में बनवाया था. यह मन्दिर मराठा स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है. इस मन्दिर के गर्भगृह में गोपाल कष्ृण के अलावा शिव-पार्वती, और बायजाबाई की प्रतिमाएँ भी है. इस मन्दिर के गर्भगृह में सुसज्जित चाँदी का द्वार विशेष दर्शनीय है. कहा जाता है. कि यह द्वार सोमनाथ के प्रसिध्द मन्दिर से गजनी ले जाया गया था. वहाँ से मुहम्मदशाह अब्दाली इसे लाहीर लाया था. महादजी सिन्धिया ने उसे प्राप्त किया और इस मन्दिर में उसी द्वार की पुन:प्रतिष्ठा की गई है।

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