ग्रहों का प्रत्येक भाव में फल | ज्योतिष सीखें

ग्रहों का प्रत्येक भाव में फल (Plantes in Different Houses)

नव ग्रह का प्रत्येक भाव में क्या फल होता है..? इसके बारे में विभिन्न ग्रंथों में सविस्तार से उल्लेख मिलता है। हम यहाँ मूलतः फल दीपिका ग्रंथ अनुसार प्रत्येक भाव में नव ग्रह का फल बता रहे हैं। यदि आपने हमारे सभी लेखों को क्रम से पढ़ा है, तो आपको भाव अनुसार ग्रह फल परिवर्तन का कारण समझने में जरा भी दिक्कत नही आएगी।

सूर्य का प्रत्येक भाव मे फल

सूर्य प्रथम भाव मे फल (Sun in First House )

यदि जन्म के समय सूर्य लग्न में हो तो जातक बहुत थोड़े केश वाला, आलसी, क्रोधी, लम्बा, मानी (घमण्डी) शूर, क्रूर, क्षमा न करने वाला होगा। उसके नेत्र रूखे होंगे। मेष, कर्क, और सिंह लग्न में सूर्य नेत्र रोग देता है।

सूर्य का दूसरे और तीसरे भाव मे फल (Sun in second & to third bHouse )

यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय, और धन से हीन होता है; उसकी वाणी में भी दोष होता है । हकलाना या इसी प्रकार का दोष हो। यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान् शूरवीर, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने (सम्बन्धी) लोगों से शत्रुता रखता है ।

सूर्य का चतुर्थ भाव मे फल (Sun in Fofth House )

यदि चौथे स्थान में सूर्य हो तो सुख हीन, बन्धु- हीन, मित्रहीन और भूमिहीन हो। चतुर्थ से इन सत्र बातों का विचार किया जाता है और क्रूर ग्रह के बैठने का यह फल है । ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति को व्यय कर देता है।

सूर्य का पंचम भाव मे फल (Sun in Fifth House )

अगर सूर्य पंचम में हो तो सुख हीन, धनहीन, आयु हीन हो। पंचम भाव का सूर्य जेष्ठ पुत्र का नाश करता है। किन्तु जातक बुद्धिमान् होता है और जंगल में घूमने का शौकीन होता है ।

सूर्य का छठे और सातवे भाव मे फल (Sun in sexth & Seven House )

यदि पष्ठ स्थान में सूर्य हो तो मनुष्य राजा के समान श्रेष्ठ वैभव वाला प्रसिद्ध धनी, विजयी और गुणवान् होता है । यदि सूर्य सप्तम में हो तो शरीर में कोई विकार हो, ऐसा व्यक्ति राज विरुद्ध कार्य करता है अर्थात् सरकार का विरोध करता है। ऐसा मनुष्य व्यर्थ घूमता है और अपमान को प्राप्त होता है। सप्तम में सूर्य स्त्री सुख को भी नष्ट करता है।

सूर्य का अष्टम भाव मे फल (Sun in eighth House )

यदि अष्टम में सूर्य हो तो धन नष्ट हो, आयु नष्ट हो (अल्पायु हो) उसके मित्र नष्ट हों (मित्र न रहें) और विगत दृष्टि हो अर्थात् नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जावे। हमने सैकड़ों कुण्डलियों में देखा है अष्टम का सूर्य बहुत बिगाड़ता है।

सूर्य का नवम भाव मे फल (Sun in Ninth House)

यदि सूर्य नवम भाव में हो तो पिता से हीन हो अर्थात् कम उम्र में ही पिता का सुख न रहे । (दक्षिण भारत में नवम भाव से पिता का विचार किया जाता है। इस कारण सूर्य का नवम भाव स्थित होने का पित कष्ट फल लिखा है )। नवम में सूर्य सन्तान सुख और बन्धु सुख देता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण और देवताओं का आदर करता है ।

दशम और एकादश भाव मे सूर्य का फल (Sun in tenth & eleventh House)

यदि दशम में सूर्य हो तो जातक को सन्तान सुख, सवारियों का सुख हो। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान्, बलवान् और यशस्वी होता है । लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और वह राजा के समान वैभवशाली होता है । यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो मनुष्य धनी और दीर्घायु हो; ऐसे व्यक्ति को शोक नहीं होता अर्थात् वह सुखी रहता है । और बहुत से आदमियों के ऊपर हुकूमत करता है ।

बारहवें भाव मे सूर्य का फल (Sun in Twelve House )

यदि बारहवें घर में सूर्य हो तो अपने पिता से शत्रुता करे। ऐसा जातक नेत्र रोग से युक्त होता है। हमारे विचार से बाएँ नेत्र में विशेष कमजोरी होनी चाहिए। ऐसा जातक धनहीन , पुत्रहीन भी होता हैं। [/accordion

चन्द्रमा का प्रत्येक भाव में फल

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यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में हो तो मनुष्य निर्भय, दृढ़ शरीर वाला, बलिष्ठ, लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है किन्तु यदि कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो इसका विपरीत फल समझना चाहिये।

यदि चन्द्रमा द्वितीय भाव में हो तो मनुष्य मृदु वचन वोलने वाला विषय सुखवान् (सांसारिक विषयों में सुख उठाने वाला) होता है । किन्तु उसकी वाणी में कुछ रहता है।

यदि तृतीय भाव में चन्द्रमा हो तो भाइयों का सुख हो; ऐसा व्यक्ति बली और शूर किन्तु अत्यन्त कृपण होता है।

यदि चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो जातक सुखी, भोगी, त्यागी, अच्छे मित्रों वाला, सवारी के सुख को प्राप्त और यशस्वी होता हैं।

यदि पंचम में चन्द्रमा हो तो मृदु गति वाला, मेधावी (बुद्धिमान्) और अच्छे पुत्र वाला हो।

यदि छठे में चन्द्रमा हो तो मनुष्य अल्पायु बुद्धि हीन और उदर रोगी हो और परिभव (अपमान या हार) को प्राप्त हो ।

यदि सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो तो स्वयं सौम्य और सुन्दर हो और उसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर होती है, दोनो में परस्पर प्रेम रहता है।

यदि अष्टम में चन्द्रमा हो तो जातक रोगी और अल्पायु होता है।

चन्द्रमा नवम में हो तो जातक धार्मिक आचरण करने वाला होगा।

यदि दशम में चन्द्रमा हो तो ऐसा जातक विजयी होता है; जिस काम में वह हाथ लगाता है उसमें प्रारम्भ में ही सफलता हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्म करने वाला और सज्जनों के साथ उपकार करने वाला होता है।

यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव मे हो तो मनुष्य मनस्वी दीर्घायु, धनवान्, पुत्रवान् होता है और उसे नौकर का भी सुख प्राप्त होता है।

द्वादश भाव में चन्द्रमा का फल शुभ नही समझा जाता। ऐसा व्यक्ति आलसी, मानसिक रूप से पीड़ित, अपमानित और दुःखी होता है।

मंगल का प्रत्येक भाव में फल

यदि लग्न में मंगल हो तो अति क्रूर और अति साहसी हो। किन्तु ऐसा व्यक्ति अल्पायु होता है और उसके शरीर में चोट भी लगती है।

यदि द्वितीय भाव में मंगल हो तो या तो चेहरा अच्छा न हो या बोलने में प्रवीण न हो।

तृतीय में मंगल हो तो गुणवान्, धनत्रान् सुखी और शूर हो; ऐसे आदमी को दूसरा न दबा सके।

तीसरे भाव में मंगल वाले को छोटे भाइयों का सुख नही होता।

यदि चतुर्थ में मंगल हो तो मनुष्प मानहीन, मित्रहीन, सुख हीन, वाहन हीन, और भूमि होन हो। कहने का तात्पर्य यह है कि चतुर्थ भाव से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करे।

यदि पंचम में मंगल हो तो सन्तान का सुख न हो; उसके भाग्य में बहुत से अनर्थ (खराबी को बातें) होते रहें। ऐसा व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् नही होता और चुगल खोर होता है ।

छठे में मंगल हो तो मनुष्य लक्ष्मीवान्, विख्यात, शत्रुओं को जीतने वाला राजा के समान ऐश्वयं शाली होता है। छठे में मंगल होने से विशेष कामी हो ।

यदि सप्तम में मंगल हो तो अनुचित कर्म करने वाला रोग से पीड़ित, मार्ग चलने वाला और मृत दारावान् (जिसकी स्त्री मर जाय) होता है। सप्तम पत्नी का स्थान है। सप्तम में मंगल होने से जातक प्रबल मंगलीक होते है इस कारण उनकी पत्नी मर जावे यह लिखा है। किन्तु पति-पत्नी दोनों मांगलिक होने से यह दोष नहीं होता। अर्थात् इस दोष की निवृत्ति हो जाती हैं।

अष्टम में भी मंगल का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कुतनु (खराब शरीर वाला अर्थात् शरीर में कहीं रोग हो), धनहीन और अल्पायु होता है और लोग उसकी निन्दा करते हैं ।

यदि मंगल नवम में हो तो मनुष्य चाहे राजा का प्यारा भी हो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं, उसे पिता का सुख प्राप्त नहीं होता ओर ऐसा व्यक्ति जन घातक (जो जनों का धात करे या पीड़ा पहुँचाए) होता है ।

यदि दशम में मंगल हो तो आदमी क्रूर, दाता, राजा के समान, पराक्रमी हो और बड़े मुख्य आदमी भी उसकी प्रशंसा करें।

ग्यारहवें स्थान में मंगल हो तो मनुष्य धनवान्, सुखवान्, शूर, सुशील और शोक रहित होता है।

यदि द्वादश में मंगल हो तो ऐसा आदमी चुगल खोर, क्रूर, अदार ( पत्नी रहित) और ऐसे व्यक्ति के नेत्र में भी विकार होता है।

ऊपर मांगलिक दोष का जिक्र आया है। जब कुंडली में मंगल 1, 4, 7, 8, 12 में स्थित होता है तो मांगलिक दोष लगता है। इस दोष का प्रभाव विवाह पर सर्वाधिक पड़ता है। जिस मनुष्य की कुंडली मंगलीक हो उसे मंगलीक कन्या से ही विवाह करना चाहिये तथा जो कन्या मंगलीक हो उसका विवाह मंगलीक वर से ही करना उचित है। इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी मांगलिक दोष संबंधित लेख में दी जाएगी।

बुध का प्रत्येक भाव में फल

यदि लग्न में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति सब शास्त्रों में विद्वान्, मधुर और चतुर वाणी बोलने वाला और दीर्घायु होता है।

यदि द्वितीय में बुध हो तो अपनी बुद्धि से धनोपार्जन करता है। कवि (वुद्धिमान् या कविता करने वाला) होता है और उसकी वाणी निर्मल होती है और उसे भोजन में मिष्टान्न प्राप्त होते रहते हैं।

यदि तृतीय भाव मे बुध हो तो मनष्य शूरवीर हो किन्तु मध्यायु हो। उसके अच्छे भाई बहन हो परन्तु ऐसे व्यक्ति को जीवन में बहुत परिश्रम करना पड़ता है।

यदि चतुर्थ में बुध हो तो मनुष्य विद्वान्, चाटु वाक्य कहने वाला (जो वचन दूसरों को प्रसन्न करें उन्हें चाटु वाक्य कहते है) होता है। उसे मित्र, क्षेत्र, धान्य, धन आदि का भोग भी प्राप्त होता है।

पञ्चम में बुध हो तो उसके सुख और प्रताप की वृद्धि विद्या के कारण होती है; और ऐसा व्यक्ति मन्त्र शास्त्र का ज्ञाता होता है।

यदि छठे में बुध हो तो मनुष्य आलमी निष्ठुर वचन बोलने वाला, अपने शत्रुओं के बल को हनन (नाश) करने वाला किन्तु विवाद करने में ऐसे मनुष्य को बहुत जल्दी और बहुत अधिक कोंच हो जाता है ।

यदि सप्तम में बुध हो तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान् सुन्दर होता है और उसकी पत्नी धनिक होती है अर्थात् धनी कुल में विवाह होता और दहेज मिलता है।

यदि अष्टम में बुध हो तो मनुष्य दण्ड नेता होता है। ऐसा व्यक्ति अपने कुल का पालन करने वाला श्रेष्ठ व्यक्ति होता है ।

यदि नवम में बुध हो तो मनुष्य विद्वान् धनवान धार्मिक और आचारवान होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत बोलने वाला (इसे सद्गुण के अर्थ में लेना चाहिये अवगुण में नहीं) और प्रवीण होता है।

दशम भाव में बुध हो तो विद्वान्, बुद्धिमान, सत्यान्वित (सत्य पर कायम रहने वाला होता है) और सफलता प्राप्त करता है। जिस कार्य को प्रारम्भ करता है उसमें प्रारम्भ में ही सिद्धि (सफलता) प्राप्त होती है।

यदि ग्यारहवे में बुध हो तो दीर्घायु सच बात पर कायम रहने वाला (अर्थात जो वचन दे दिया उसे पूरा करने वाला) विपुल धन वाला होता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरों का सुख भी प्राप्त होता है।

द्वादश में बुध का निकृष्ट फल है ऐसा व्यक्ति दीन, आलसी, क्रूर, विद्याहीन होता है तथा अपमान को भी प्राप्त होता है ।

बृहस्पति का प्रत्येक भाव में फल

यदि लग्न में बृहस्पति हो तो शोभावान्, सत्कर्म करने वाला दीर्घायु और निर्भय हो; उसे पुत्र सुख भी प्राप्त हो।

यदि द्वितीय में बृहस्पति हो तो बुद्धिमान्, सुन्दर मुख वाला और वाग्मी ( बोलने में कुशल) होता है। ऐसे मनुष्य को उत्तम भोजन प्राप्त होते हैं। अर्थात् द्वितीय भाव से जो-जो बातें देखी जाती है उन सबका सुख प्राप्त होता है।

यदि तृतीय में बृहस्पति हो तो पापकर्मा, दुष्ट बुद्धि वाला, कृपण और अवज्ञा (अनादर) सहित हो। किन्तु उसका भाई किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुंचे या विख्यात हो।

यदि चतुर्थ में बृहस्पति हो तो माता मित्र, पुत्र स्त्री, धान्य आदि का सुख प्राप्त हो।

यदि पंचम में बृहस्पति हो तो मिश्रित फल है। जातक बुद्धिमान् और राजा का मन्त्री होता है; किन्तु पुत्रों के कारण दुखी भी होता है। पुत्र उत्पन्न न होना भी क्लेश है, पुत्र का अभाव भी पुत्र- क्लेश है। पुत्र उत्पन्न होने पर नष्ट हो जावे यह भी पुत्रों से क्लेश है, तथा पुत्रों के आचरण से से कलेश उठाना पड़े या मन को क्लेश हो यह भी पुत्रों से क्लेश हुआ ।

छडे में बुहुस्पति हो तो शत्रुओं का नाश करने वाला आलसी, स्वयं अपमान को प्राप्त होने वाला, किन्तु मन्त्राभिचार (मन्त्रों का अनुष्ठान) करने वाला तथा चतुर होता है। यदि सप्तम मेंबृहस्पति हो तो उत्तम स्त्रीमामी वाला, पुत्रवान्, सुन्दर, अपने पिता से अधिक उदार होता है । कुछ अन्य पुस्तकों में यह भी लिखा है कि जिसके सप्तम में बृहस्पति हो वह अपने पिता से श्रेष्ठ पदवी को प्राप्त हो।

अष्टम में बृहस्पति का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति दीन होता है और नौकरी से धनोपार्जन करता है। अष्टम में बृहस्पति वाला जपन्यकर्म (निकृष्ट कर्म करने वाला) किन्तु दीर्घायु होता है।

यदि नवम में बृहस्पति हो तो जातक धनवान्, पुत्रवान्, विख्यात, धर्म कार्य के लिए उत्सुक और राजा का मन्त्री होता है। ऐसे व्यक्ति की धार्मिक कार्यों में प्रवृत्ति रहती है।

यदि वृहस्पति दशम भाव में हो तो जातक अत्यन्त घनी और राजा का प्यारा होता है। ऐसा व्यक्ति उत्तम आचरण करने वाला और यशस्वी भी होता है।

यदि ग्यारहवें घर में बृहस्पति हो तो मनुष्य धनिक, निर्भय और दीर्घायु होता है। ऐसे व्यक्ति के पास सवारियां भी होती हैं किन्तु सन्तान थोड़ी होती है। यदि वृहस्पति बारहवें घर में हो तो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं और जातक स्वयं बुरे शब्द बोलने वाला, सन्तान हीन, आलसी, और सेवक (सेवा करने वाला) होता है।

शुक्र का प्रत्येक भाव में फल

यदि लग्न में शुक्र हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला, नेत्रों को प्यारा लगने वाला, मुखी और दीर्घायु होता है।

यदि द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो अनेक प्रकार के धन से युक्त, जातक स्वयं कवि भी होता है ।

शुक्र यदि तृतीय स्थान में ही तो निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कृपण, अप्रिय, मुख और सम्पनि से हीन, बिना स्त्री के रहता है।

यदि चतुर्थ में शुक हो तो अच्छ सवारी, अच्छा मकान, आभूषण, वस्त्र, सुगन्धित पदार्थों से सम्पन्न हो।

यदि शुक्र पंचम भाव में हो तो मनुष्य पूर्ण धनयुक्त राजा के समान वंभव वाला, पुत्र सौख्य से युत स्वयं बहुत बुद्धिमान होता है।

यदि शुक्र छठे घर में हो तो उसके कोई शत्रु नहीं होंगे किन्तु धन हीन होगा। अनेक युवतियों से उसका सम्बन्ध हो और वह स्वयं दुखी हो।

सप्तम में शुक्र हो तो मनुष्य को अच्छी पत्नी प्राप्त होगी लेकिन हो सकता है पत्नी शान्त (मृत) हो जाय। ऐसा व्यक्ति धनी होता है और स्त्रियों में आसक्त रहता है ।

अष्टम में शुक्र हो तो धनी, दीर्घायु, और भूमिपति हो।

यदि नवम में शुक्र हो तो राजा (सरकार) की कृपा से भाग्योदय होता है। ऐसे व्यक्ति को स्त्री, पुत्र, तथा मित्रों का सुख प्राप्त रहना है।

यदि शुक्र दशम भाव में हो तो जातक को अच्छा कार्य करने को मिले। उसे मित्रों का सुख हो, अत्यन्त सम्मान, यश और ऊंची पदवी प्राप्त हो। यदि एकादश में शुक्र हो तो धनी हो, दूसरों की स्त्रियों में रत रहे और अनेक प्रकार के सुख प्राप्त हों ।

यदि शुक्र बारहवें घर में हो तो ऐसे व्यक्ति को रति (स्त्रयों के साथ संयोग का सुख) धन और वैभव प्राप्त हो।

शनि का प्रत्येक भाव में फल

यदि शनि अपनी उच्चराशि (तुला) या स्वराशि ( मकर या कुंभ) में स्थित होकर लग्न में हो तो राजा के समान हो। यदि किसी अन्य राशि में स्थित शनि यदि लग्न में हो तो बचपन में दुःख परिपीड़ित हो और बाद में भी दरिद्री, दुःखी, मलिन और आलसी हो।

यदि शनि दूसरे घर में हो तो उसका चेहरा देखने में अच्छा न होगा। ऐसा व्यक्ति अन्याय मार्ग पर चलेगा और धनहीन होगा। किन्तु बाद में (जीवन के उत्तरार्द्ध में) वह अपना निवास स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चला जावेगा और वहां धन, सवारी तथा भोग (सुख के साधन) प्राप्त करेगा।

यदि तृतीय में शनि हो तो जातक, बहुत बुद्धिमान् और उदार हो तथा उसे स्त्री सुख भी प्राप्त हो। किन्तु वह आलसी और दुःखी होता है।

यदि जन्म कुण्डली में शनि चौथे घर में हो तो मनुष्य गृहहीन और मानहीन होता है। ऐसा व्यक्ति बचपन में रोगी भी रहता है। चतुर्थ सुख स्थान है। शनि यहां बैठकर सुख को नष्ट कर देता है इसलिये ऐसा मनुष्य सदैव दुःखी रहता है। चौथे घर से माता, मकान, यान (सवारी) आदि का विचार किया जाता है इसलिये इनके सुख में भी कमी करे

यदि पंचम में शनि हो तो मनुष्य शठ (शैतान) और दुष्ट बुद्धि वाला होता है और ज्ञान, सूत, घन तथा हर्ष इन चारों से रहित होता है-अर्थात् इन चीज की कमी करता है। ऐसा मनुष्य भ्रमण करता है।

यदि छठे घर में शनि हो तो जातक बहुत भोजन करने वाला, धनी, अपने शत्रुओं का नाश करने वाला (अर्थात् जातक के शत्रु को जातक ही हानि पहुंचावें), घृष्ट (ढीठ) अभिमानी होता है।

यदि सप्तम में शनि हो तो कुदार निरत (कुत्सित स्त्री में रत) दरिद्री और दुःखी होता है।

यदि अष्टम भाव में शनि हो तो जातक मलिन, बवासीर के रोग से पीड़ित धनहीन, क्रूर बुद्धि , भूखा हो और उसके मित्र उसकी अवहेलना करें।

यदि नवम में शनि हो तो भाग्यहीन, धनहीन, सन्तानहीन, पितृ हीन, धर्महीन होता है। नवम भाव से जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करता है।

शनि नवम में हो तो धार्मिक विचारों में क्रान्ति लावेगा। बलवान् शनि यदि धर्म स्थान पर बैठे और उसपर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो मनुष्य धार्मिक तथा तपस्वी होता है। क्योंकि नवम तपस्या का स्थान है यहां शनि वैराग्य उत्पन्न करता है।

यदि दशम में शनि हो तो उत्कृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति राजा हो या राजा का मन्त्री हो, अत्यन्त धनी, प्रसिद्ध और शुर हो और कृषि कार्य में तत्पर हो। पहले कृषि कार्य सबसे उत्तम व्यवसाय माना जाता था इसीलिये ऐसा लिखा है । आधुनिक समय में इसका अर्थ करना चाहिये कि उत्तम व्यवसाय करे ।

यदि म्यारहवें घर में शनि हो तो आय सहित, शूर, निरोगी (स्वस्थ), घनी, दीर्घायु और स्थिर सम्पत्ति वाला हो।

बारहवें भाव में शनि हो तो अनिष्ट फल है । ऐसा व्यक्ति निर्लज्ज, धन हीन, पुत्र से वंचित, विकलांग (शरीर के किसी भाग में विकलता) और मूर्ख होता है । उसके शत्रु उसे उत्सारित ( दूर फेंकना) कर देते हैं । हमारा अनुभव है कि द्वादश में शनि दाँतों को भी खराब करता और नेत्रों को भी हानि पहुंचाता है ।

राहु का प्रत्येक भाव में फल

यदि लग्न में राहु हो तो अल्प आयु वाला, धनी, बलवान् होता है। किन्तु इसके शरीर के ऊपर के हिस्से में कोई रोग हो।

यदि द्वितीय स्थान में राहु हो तो वह गुप्त बात बोलने वाला और दो अर्थ की बात बोलने वाला हो। ज्योतिष में राहु को चोर माना गया है। और द्वितीय स्थान वाणी का स्थान है। इस कारण जिसके द्वितीय में राहु होगा वह कपट को बाणी बोलेगा द्वितीय में राहु होने से मुख रोग भी होता है । ऐसा व्यक्ति क्रोधी भी होता है।

यदि राह तृतीय में हो तो जातक मानी, भाइयों का विरोधी, घनी, दीर्घायु, और दन बुद्धि वाला होता है।

यदि चतुर्थ में राहु हो तो जातक मूर्ख, दुःख देने वाला किन्तु मित्रों सहित होता है।

यदि पंचम में राहु हो तो पुत्रहीन, कठोर हृदय, और कुक्षि में रोग वाला हो । पेट का नीचे का बगली भाग कुक्षि कहलाता है । ऐसा व्यक्ति नाक से बोलता है-अर्थात् उस के बोलने में अनुनासिकता विशेष रहती है।

यदि छठे स्थान में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु हो, किन्तु छठे में रात गुदा रोग उत्पन्न करता है। ऐसा व्यक्ति शत्रु द्वारा या क्रूर ग्रह द्वारा पीड़ित भी होता है ।

यदि सप्तम में राहु हो तो जातक स्वतन्त्र, किन्तु अल्पबुद्धि वाला हो, के नष्ट हो जाय, ऐसा व्यक्ति विधुर और अवीर्य हो जाता है। पत्नी रहित हो जाने को विधुर कहते हैं।

यदि अष्टम में राहु हो तो जातक विकल वात रोग से पीड़ित, अस्प सुत वाला, अल्पायु और अशुद्ध कर्म करने वाला होता है।

यदि नवम में गहु हो तो जातक प्रतिकूल वचन बोलने वाला और अपुष्पवान होता है (अर्थात् पुष्य कर्म न करने वाला) किन्तु किसी समुदाय, नगर या ग्राम का नेता होता है।

यदि दशम में राहु हो तो थोडे पुत्र वाला, सत्कर्म हीन, निर्भय, किन्तु विख्यात हो।

यदि एकादश में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है किन्तु पुत्र थोड़े होते हैं और कान में कोई रोग होता है।

द्वादश में राहु का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति किसी जल रोग से पीड़ित और बहुत अधिक व्यय करने वाला होता है।

केतु का प्रत्येक भाव में फल

यदि केतु लग्न में हो तो जातक कृतघ्न, सुखहीन, चुगलखोर, असज्जनों के साथ रहन बाला, विकल देह (शरीर के किसी अंग में विकलता हो), स्थानच्युत, तथा विवरण होता है। विवर्ण शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं । वर्ण शब्द के दो अर्थ होते हैं १. जाति और २. शरोर का रंग, इसलिये विवर्ण का अर्थ हो सकता है जातिभ्रष्ट और दूसरा अर्थ हो सकता है जिसके शरीर का रंग अच्छा न हो।

यदि केतु दूसरे स्थान में हो तो विद्याहीन, धनहीन, निकृष्ट बचन बोलने वाला कुदृष्टि’ बाला, और दूसरे के यहाँ भोजन करने में निरत होता होना महान् दोष है।

तृतीय भवन में केतु हो तो दीर्घायु, बलवान्, धनी और यशस्वी हो, ऐसे व्यक्ति को स्त्री सुख और अन्न सुख भी हों किन्तु तृतीय में केतु भाई को नष्ट करता है ।

यदि चतुर्थ में केतु हो तो जातक दूसरे के घर में रहता है और उसकी अपनी भूमि, खेत, माता सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। उसे जन्म भूमि भी छोड़नी पड़ती है ।

पंचम में केतु पुत्र क्षय करता है। उदर रोग भी होता है।

यदि षष्ठ में केतु हो तो जातक उदार, उत्तम गुण वाला, दृढ़, प्रसिद्ध, प्रभु (श्रेष्ठपद प्राप्त करने वाला) शत्रुओ को पराजित करने वाला होता हैं ऐसे व्यक्ति को प्रायः इष्ट सिद्धि होती है ।

यदि सप्तम में केतु हो तो जातक का अपमान होता है। ऐसा जातक व्यभिचारिणी स्त्रियों में रति करता है, स्वयं अपनी पत्नी से वियोग हो। अंतड़ियों का रोग हो और धातु (वीर्य) रोग भी हो। हमारा अनुभव है कि जिसके सप्तम में केतु हो उसकी पत्नी रोगिणी रहती है ।

यदि अष्टम में केतु हो तो इष्ट (प्रियजनों) का विरह हो, कलह करे और जातक स्वल्पायु हो। अष्टम में केतु वाले को प्रायः शस्त्र से चोट लगती है और उसके सब उद्योगों में विरोध होता है।

यदि केतु नवम भाव में हो तो पाप प्रवृत्ति वाला, भाग्यहीन, दरिद्री, और सज्जनों की निन्दा करने वाला होता है।

यदि दशम में केतु हो तो सत्कर्म करने में अनेक विध्न या जातक स्वयं सत्कर्म में विघ्न उपस्थित करे, ऐसा व्यक्ति अत्यन्त तेजस्वी और अपनी शूर वीरता के लिए प्रसिद्ध है। किन्तु ऐसा व्यक्ति दुष्ट कर्मा और अशुद्ध होता है।

यदि लाभ स्थान में केतु हो तो उत्तम द्रव्य वाला, द्रव्य संग्रह करने वाला, अनेक गुणान्वित, उत्तम भोगों से युक्त होता है। ऐसे व्यक्ति के पास बहुत से भोग्य पदार्थ रहते हैं और सब कार्यों में उसे सिद्धि प्राप्त होती है।

द्वादश भावस्थ केतु का अनिष्ट फल है ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप से पाप करता है और दुष्ट कार्यों में घन व्यय करता है। ऐसे व्यक्ति प्रायः अपना धन नष्ट कर देते हैं ऐसे लोगों को नेत्र रोग भी होता है ।

नोट:- मात्र ग्रह की भाव में स्थिति देखकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाना चाहिए। ग्रह कितने अंश का है, किस राशि में है, उस भाव का स्वामी कहा है। ग्रह पर किन-किन ग्रहों का की दृष्टि है। कतरी योग तो नही है। आदि कई बातें विचारणीय होती है। जिनका सामंजस्य बिठाकर ही फल कथन किया जाता है।

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