रावुरि भारद्वाज (Ravuri Bharadhwaj)

रावुरी भारद्वाज (1927 – 18 अक्टूबर 2013) ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता तेलुगू उपन्यासकार, लघु-कथा लेखक, कवि एवं समीक्षक थे। रावुरी जी ने कुल 37 लघु कथाएँ, सत्रह उपन्यास, चार नाटक एवं पाँच रेडियो रूपान्तरण लिखे।


रावुरि भारद्वाज (उपन्यासकार)

जन्म (Born)05 जुलाई 1927 मोगुलूरू, हैदराबाद
मृत्यु (Telgu Novelist)18 अक्टूबर 2013 (उम्र 86)
हैदराबाद, भारत
व्यवसाय (Occupation)लेखक
भाषा (Language)तेलुगू
शिक्षा (Education)7 वीं पास
व्यवसाय (works)पाकुडु राल्लु
सम्मान awardsअकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार
जीवनसाथी (Spouse)कान्थम
सन्तान (Children)5 (4 पुत्र और 1 पुत्री)

रावुरी भारद्वाज निबंध, जीवनी (Ravuri Bhardwaj Biography in Hindi)

भारतीय भाषाओं की जड़े सांस्कृतिक तौर पर काफी गहरी है। ये जड़े एक तरफ जहां भाषाई अस्मिता का विशाल फलक रही हैं। वहीं इनसे भारतीय संस्कृति की सामाजिक विलक्षणता पुष्ट होती हैं। यह बात उन लोगो को खस तौर पर समझने की जरूरत हैं। जो भाषाई वर्चस्व की बात करते हैं और भारतीय भाषा परिवार की विशालता, विविधता, और उनके अंतर्संबंधों को देखने समझने का आपेक्षित विविक नहीं रखते।

महान तेलगु उपन्यासकार ( Great Telgu Novelist)

तेलुग ऐसी ही एक समृद्ध भारतीय भाषा हैं। जिसका संस्कृति आधार काफी मजबूत है। आधुनिक भारत में बाज़ार और शिक्षा और माध्यम के भाषाई इकहरेपन के कारण तेलगु साहित्य की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी कम जरूर हुई है। पर इसका यह कतई मतलब नहीं है कि इस भाषा का अवदान आधुनिक भारत के सांस्कृतिक विमर्श किसी अन्य भाषा से कम है।

तेलगु साहित्यकार रावुरी भारद्वाज की चर्चा से पहले यह पृष्ठ भूमि इसलिए ताकि हम समझ सके की चर्चा करना किसी आधुनिक भारतीय विमर्श से कटना नहीं बल्कि उससे गहरे तौर पर जुड़ना है।

रावुरी भारद्वाज के नाम और कृतित्व की चर्चा तब अखिल भारतीय स्तर पर हुई जब यह शोषणा हुई कि 2012 के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुने गए है। दिलचस्प है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 से मिलना शुरू हुआ था। तेलगु की झोली में यह पुरस्कार पहली बार 1970 में जब विश्वनाथ सत्यनारायण को मिला। इसके 18 साल बाद 1988 में डॉ नारायण रेड्डी को यह पुरस्कार मिला। रेड्डी से भारद्वाज तक लंबा अंतराल है, परंतु यह अंतराल तेलगु साहित्य का अपना अंतराल या रचनात्मक सन्नाटा नहीं हैं।

भारद्वाज की ही चर्चा करे तो न सिर्फ लगातार रचनाशील रहे बल्कि इस दौरान उन्हें भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में प्रभावशाली हस्तक्षेप भी किया। बरहाल, भारद्वाज का स्थान तेलगु साहित्य में एक विशाल वट वृक्ष की तरह हैं। जिसकी छाया और सानिध्य में एक से ज्यादा पीढ़ी के साहित्यकारों – पाठको ने काफी कुछ सीखा – पढ़ा है। उन्हें अपने जीवन में अवहेलना बात बार झेलनी पड़ी हैं। यहां तक कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भी उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में प्राप्त हुआ हैं।

सक्रिय काल में वह आकाशवाणी से जुड़े रहे। तेलगु में आकाशवाणी के लिए बाल कार्यक्रम ‘बाला नंदम ‘ की परिकल्पना उन्होंने ही की थी, जो आज भी लोकप्रिय है।


पुरस्कार और सम्मान (Awards and Honours)

रावुरी भारद्वाज अपनी कहानी के जरिए वे आम आदमी के काफी करीब थे। इनके द्वारा रचित एक रेखाचित्र जीवन समरम् के लिये उन्हें सन् 1983 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके अलावा वर्ष 2012 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मनित किया गया।


रावुरी भारद्वाज निधन (Raturi Bhardwaj Dead)

तेलुगु साहित्य का अक्षर-पुरुष रावुरी भारद्वाज ने 18 अक्टूबर 2013 को हैदराबाद के बंजारा हिल्स अस्पताल की देखरेख में अन्तिम साँसे ली।


Last Updated on 09/05/2021

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