शिव पुराण

Shiv Puran

शिवपुराण (Shiv Puran in Hindi)

शिव पुराण, हिंदुओं के पवित्र 18 पुराणों में से एक है, पुराणो के क्रम में इसका स्थान चतुर्थ है। ‘शिव पुराण’ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। 6 खंडों और 24,000 श्लोको से युक्त शिव पुराण सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण पुराणों में से एक है।

The Shiv Puran is one of the eighteen major Purana genre of Sanskrit texts in Hinduism, and part of the Shaivism literature corpus. It primarily centers around the Hindu god Shiva and goddess Parvati, but references and reveres all gods.


शिव स्वरूप की व्याख्या

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शिव ही ब्रह्माण्डीय अस्तित्व का आधार है। देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णु तक शिव की उपासना करते है।

पौराणिक मान्यता अनुसार- अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति शिव को प्रसन्न करने के लिए सुगंधित पुष्पमाला और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती। शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं।

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जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं शरीर पर बाघम्बर,चिता की भस्म, हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए है। शिव की वेशभूषा से ‘जीवन’ और ‘मृत्यु’ का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।

समुन्द्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए लड़ रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण किया था। विश के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, इसलिए नीलकंठ कहलाए। ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही शिव पुराण की रचना की गई है।


शिव पुराण में क्या है?

‘शिवपुराण’ (shiv puran) एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है, इसमे शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। भगवान शिवमात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर, ब्रह्माण्डीय अस्तित्व का आधार एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं।

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शिव पुराण में शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है। सभी पुराणों में शिव पुराण (shiv puran) को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसमें भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगोंऔर भक्ति का विशद् वर्णन किया गया है। इस पुराण में कुल 6 खंड है, जिसमे 24,000 श्लोक है।

  1. विद्येश्वर संहिता
  2. रुद्र संहिता
  3. कोटिरुद्र संहिता
  4. उमा संहिता
  5. कैलास संहिता
  6. वायु संहिता

शिव पुराण का महत्व

‘शिवपुराण’ (Shiv Puran) में शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। ‘शिव’ का अर्थ ही है- ‘कल्याणस्वरूप’ और ‘कल्याणप्रदाता’।

शिव पुराण का पठन और श्रवण सर्वसाधनरूप है। इससे शिव भक्ति पाकर श्रेष्ठतम स्थिति में पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही शिवपद को प्राप्त कर लेता है। भगवान शिव के इस पुराण को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।