श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र ॥ Sri Ganesha Pancharatnam Stotram

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श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र (Ganesha Pancharatnam Stotram Hindi)

भगवान गणेश (Lord Ganesha) विघ्नहर्ता हैं, यदि गणेश जी प्रसन्न हो जाये तो जीवन में किसी चीज़ का अभाव नही रहता, सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। विघ्नहर्ता भगवान को प्रसन्न करने के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री गणेश पंचरत्नम स्तोत्र (Shri Ganesha Pancharatna Stotram) का महत्व अनन्य हैं। संस्कृत में लिखे इस श्लोक में भगवान गणपति (गणेश) की महिमा का बखान किया गया हैं। 

जो व्यक्ति प्रातः काल स्नानादी से निर्वत होकर श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र (Ganesha Pancharatnam Stotram) का नित्य पाठ करता हैं। उसे भगवान गणेश की अनुकम्पा प्राप्त होती है। उसके जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता और सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।


॥ श्री गणेशपञ्चरत्नम्स्तोत्रं ॥  

मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम्
कलाधरावतंसकं विलासलोक रक्षकम्।
अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम्
नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम्॥ ॥1॥

अनुवाद – मैं श्री गणेश भगवान को बहुत ही विनम्रता के साथ अपने हाथों से मोदक प्रदान (समर्पित) करता हूं, जो मुक्ति के दाता- प्रदाता हैं। जिनके सिर पर चंद्रमा एक मुकुट के समान विराजमान है, जो राजाधिराज हैं और जिन्होंने गजासुर नामक दानव हाथी का वध किया था, जो सभी के पापों का आसानी से विनाश कर देते हैं, ऐसे गणेश भगवान जी की मैं पूजा करता हूं।

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नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम्
नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्धरम्।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥ ॥2॥

अनुवाद – मैं उस गणेश भगवान पर सदा अपना मन और ध्यान अर्पित करता हूं जो हमेशा उषा काल की तरह चमकते रहते हैं, जिनका सभी राक्षस और देवता सम्मान करते हैं, जो भगवानों में सबसे सर्वोत्तम हैं।

समस्त लोक शङ्करं निरस्त दैत्यकुंजरं
दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्रमक्षरम्।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥3॥

अनुवाद – मैं अपने मन को उस चमकते हुए गणपति भगवान के समक्ष झुकाता हूं, जो पूरे संसार की खुशियों के दाता हैं, जिन्होंने दानव गजासुर का वध किया था, जिनका बड़ा सा पेट और हाथी की तरह सुन्दर चेहरा है, जो अविनाशी हैं, जो खुशियां और प्रसिद्धि प्रदान करते हैं और बुद्धि के दाता – प्रदाता हैं।

अकिंचनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनं
पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम्।
प्रपंच नाश भीषणं धनंजयादि भूषणं
कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम्॥4॥

अनुवाद – मैं उस भगवान की पूजा-अर्चना करता हूं जो गरीबों के सभी दुख दूर करते हैं, जो ॐ का निवास हैं, जो शिव भगवान के पहले पुत्र (बेटे) हैं, जो परमपिता परमेश्वर के शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं, जो विनाश के समान भयंकर हैं, जो एक गज के समान दुष्ट और धनंजय हैं और सर्प को अपने आभूषण के रूप में धारण करते हैं।

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नितान्त कान्त दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजं
अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम्।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥5॥

अनुवाद – मै सदा उस भगवान को प्रतिबिंबित करता हूं जिनके चमकदार दन्त (दांत) हैं, जिनके दन्त बहुत सुन्दर हैं, स्वरूप अमर और अविनाशी हैं, जो सभी बाधाओं को दूर करते हैं और हमेशा योगियों के दिलों में वास करते हैं।

महागणेश पंचरत्नमादरेण यो‌உन्वहम् ।
प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।
समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सो‌உचिरात् ॥

अनुवाद – जो भी भक्त प्रातःकाल में गणेश पंचरत्न स्तोत्र का पाठ करता है, जो भगवान गणेश के पांच रत्न अपने शुद्ध हृदय में याद करता है तुरंत ही उसका शरीर दाग-धब्बों और दुखों से मुक्त होकर स्वस्थ हो जायगा, वह शिक्षा के शिखर को प्राप्त करेगा, जीवन शांति, सुख के साथ आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि के साथ सम्पन्न हो जायेगा।

॥ इति श्री गणेशपञ्चरत्नम्स्तोत्रं संपूर्णम् ॥  

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