उत्पन्ना एकादशी : व्रत कथा, मुहूर्त एवं पूजा विधि

मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में एकादशी को ‘उत्पन्ना एकादशी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन करने से अधूरी मनोकामनाएं विष्णु भगवान अवश्य पूरी करते है। इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी 30 नवम्बर को है।


उत्पन्ना एकादशी व्रत

आधिकारिक नामउत्पन्ना एकादशी व्रत
तिथिमार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में एकादशी
अनुयायीहिन्दू
प्रकारव्रत
उद्देश्यसर्वकामना पूर्ति
सम्बंधित लेखएकादशी व्रत

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी या उत्पत्ति एकादशी का व्रत हेमन्त ऋतु में मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार कार्तिक ) को करना चाहिए। इसकी कथा इस प्रकार हैं:

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा : भगवन् ! पुण्यमयी एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई? इस संसार में वह क्यों पवित्र मानी गयी तथा देवताओं को कैसे प्रिय हुई?

श्रीभगवान बोले कुन्ती नन्दन ! प्राचीन समय की बात है। सत्ययुग में मुर नामक दानव रहता था। वह बड़ा ही अदभुत, अत्यन्त रौद्र तथा सम्पूर्ण देवताओं के लिए भयंकर था। उस कालरुपधारी दुरात्मा महासुर ने इन्द्र को भी जीत लिया था। सम्पूर्ण देवता उससे परास्त होकर स्वर्ग से निकाले जा चुके थे और शंकित तथा भयभीत होकर पृथ्वी पर विचरा करते थे। एक दिन सब देवता महादेवजी के पास गये यहाँ इन्द्र ने भगवान शिव के आगे सारा हाल कह सुनाया ।

इन्द्र बोले महेश्वर ये देवता स्वर्गलोक से निकाले जाने के बाद पृथ्वी पर विचर रहे हैं । मनुष्यों के बीच रहना इन्हें शोभा नहीं देता। देव कोई उपाय बतलाइये देवता किसका सहारा ले ?

महादेवजी ने कहा देवराज जहाँ सबको शरण देनेवाले, सबकी रक्षा में तत्पर रहने वाले जगत के स्वामी भगवान गरुडध्वज विराजमान हैं, यहाँ जाओ। वे तुम लोगों की रक्षा करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं युधिष्ठिर महादेवजी की यह बात सुनकर परम बुद्धिमान देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं के साथ क्षीरसागर में गये जहाँ भगवान गदाधर सो रहे थे। इन्द्र ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

इन्द्र बोले: देवदेवेश्वर !आपको नमस्कार है। देव आप ही पति, आप ही मति, आप ही कर्ता और आप ही कारण हैं। आप ही सब लोगों की माता और आप ही इस जगत के पिता हैं। देवता और दानव दोनों ही आपकी वन्दना करते हैं। पुण्डरीकाक्ष आप दैत्यों के शत्रु हैं।

मधुसूदन ! हम लोगों की रक्षा कीजिये। प्रभो! जगन्नाथ ! अत्यन्त उग्र स्वभाव वाले महाबली मुर नामक दैत्य ने इन सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर स्वर्ग से बाहर निकाल दिया है। भगवन् ! देवदेवेश्वर शरणागत वत्सल देवता भयभीत होकर आपकी शरण में आये हैं। दानवों का विनाश करनेवाले कमलनयन भक्तवत्सल देवदेवेश्वर जनार्दन हमारी रक्षा कीजिये… रक्षा कीजिये। भगवन् शरण में आये हुए देवताओं की सहायता कीजिये।

इन्द्र की बात सुनकर भगवान विष्णु बोले देवराज यह दानव कैसा है ? उसका रूप और बल कैसा है तथा उस दुष्ट के रहने का स्थान कहाँ है?

इन्द्र बोले देवेश्वर पूर्वकाल में ब्रह्माजी के वंश में तालजंघ नामक एक महान असुर उत्पन्न हुआ था, जो अत्यन्त भयंकर था। उसका पुत्र मुर दानव के नाम से विख्यात है। वह भी अत्यन्त उत्कट महापराक्रमी और देवताओं के लिए भयंकर हैं।

चन्द्रावती नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है, उसी में स्थान बनाकर वह निवास करता है। उस दैत्य ने समस्त देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्गलोक से बाहर कर दिया है। उसने एक दूसरे ही इन्द्र को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठाया है। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, वायु तथा वरुण भी उसने दूसरे ही बनाये हैं। जनार्दन मैं सच्ची बात बता रहा हूँ। उसने सब कोई दूसरे ही कर लिये हैं देवताओं को तो उसने उनके प्रत्येक स्थान से वंचित कर दिया है।

इन्द्र की यह बात सुनकर भगवान जनार्दन को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने देवताओं को साथ लेकर चन्द्रावती नगरी में प्रवेश किया। भगवान गदाधर ने देखा कि दैत्यराज बारंबार गर्जना कर रहा है और उससे परास्त होकर सम्पूर्ण देवता दसों दिशाओं में भाग रहे हैं।

अब वह दानव भगवान विष्णु को देखकर बोला खड़ा रह खड़ा रह उसकी यह ललकार सुनकर भगवान के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। वे बोले ‘अरे दुराचारी दानव मेरी इन भुजाओं को देख।यह कहकर श्रीविष्णु ने अपने दिव्य बाणों से सामने आये हुए दुष्ट दानवों को मारना आरम्भ किया। दानव मय से चिह्नल हो उठे।

पाण्ड्डनन्दन! तत्पश्चात् श्रीविष्णु ने दैत्य सेना पर चक्र का प्रहार किया। उससे छिन्न भिन्न होकर सैकड़ो योद्धा मौत के मुख में चले गये।

इसके बाद भगवान मधुसूदन बदरिकाश्रम को चले गये। वहाँ सिंहावती नाम की गुफा थी, जो बारह योजन लम्बी थी। पाण्ड्डनन्दन उस गुफा में एक ही दरवाजा था। भगवान विष्णु उसी में सो गये । वह दानव मुर भगवान को मार डालने के उद्योग में उनके पीछे पीछे तो लगा ही था।

अतः उसने भी उसी गुफा में प्रवेश किया। वहाँ भगवान को सोते देख उसे बड़ा हर्ष हुआ । उसने सोचा यह दानवों को भय देनेवाला देवता है। अतः निःसन्देह इसे मार डालूँगा । युधिष्ठिर दानव के इस प्रकार विचार करते ही भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई, जो बड़ी ही रुपवती, सौभाग्यशालिनी तथा दिव्य अस्त्र शखों से सुसज्जित थी।

वह भगवान के तेज के अंश से उत्पन्न हुई थी। उसका बल और पराक्रम महान था। युधिष्ठिर दानवराज मुर ने उस कन्या को देखा। कन्या ने युद्ध का विचार करके दानव के साथ युद्ध के लिए याचना की। युद्ध छिड़ गया । कन्या सब प्रकार की युद्धकला में निपुण थी। यह मुर नामक महान असुर उसके हुंकारमात्र से राख का ढेर हो गया। दानव के मारे जाने पर भगवान जाग उठे। उन्होंने दानव को धरती पर इस प्रकार निष्प्राण पड़ा देखकर कन्या से पूछा मेरा यह शत्रु अत्यन्त उग्र और भयंकर था किसने इसका वध किया है ?”

कन्या बोली: स्वामिन् ! आपके ही प्रसाद से मैंने इस महादैत्य का वध किया है।

श्रीभगवान ने कहा कल्याणी! तुम्हारे इस कर्म से तीनों लोकों के मुनि और देवता आनन्दित हुए हैं। अतः तुम्हारे मन में जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार मुझसे कोई वर माँग लो। देवदुर्लभ होने पर भी वह वर मैं तुम्हें दूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह कन्या साक्षात् एकादशी ही थी।

उसने कहाः प्रमों यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपकी कृपा से सब तीर्थों में प्रधान, समस्त विघ्नों का नाश करनेवाली तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाली देवी होऊं जनार्दन जो लोग आपमें भक्ति रखते हुए मेरे दिन को उपवास करेंगे, उन्हें सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो । माधव जो लोग उपवास, नक्त भोजन अथवा एकभुक्त करके मेरे व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म और मोक्ष प्रदान कीजिये ।

श्रीविष्णु बोलेः कल्याणी! तुम जो कुछ कहती हो, यह सब पूर्ण होगा।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं युधिष्ठिर ऐसा वर पाकर महावता एकादशी बहुत प्रसन्न हुई। दोनों पक्षों की एकादशी समान रूप से कल्याण करने वाली है। इसमें शुक्ल और कृष्ण का भेद नहीं करना चाहिए। यदि उदयकाल में थोड़ी सी एकादशी, मध्य में पूरी द्वादशी और अन्त में किंचित् त्रयोदशी हो तो वह ‘त्रिस्पृशा एकादशी कहलाती है।

वह भगवान को बहुत ही प्रिय है। यदि एक ‘त्रिस्पृशा एकादशी’ को उपवास कर लिया जाय तो एक हजार एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है तथा इसी प्रकार द्वादशी में पारण करने पर हजार गुना फल माना गया है। अष्टमी, एकादशी. षष्ठी, तृतीय और चतुर्दशी ये यदि पूर्वतिथि से विद्व हो तो उनमें व्रत नहीं करना चाहिए परवर्तिनी तिथि से युक्त होने पर ही इनमें उपवास का विधान है। पहले दिन में और रात में भी एकादशी हो तथा दूसरे दिन केवल प्रातः काल एकदण्ड एकादशी रहे तो पहली तिथि का परित्याग करके दूसरे दिन की द्वादशीयुक्त एकादशी को ही उपवास करना चाहिए। यह विधि मैंने दोनों पक्षों की एकादशी के लिए बतायी है।

जो मनुष्य एकादशी को उपवास करता है, यह वैकुण्ठधाम में जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान गरुडध्वज विराजमान रहते हैं जो मानव हर समय एकादशी के माहात्मय का पाठ करता है, उसे हजार गौदान के पुण्य का फल प्राप्त होता है। जो दिन या रात में भक्तिपूर्वक इस माहात्म्य का श्रवण करते हैं, वे निःसंदेह ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं। एकादशी के समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है ।


2021 में उत्पन्ना एकादशी एकादशी व्रत कब है? (Utpanna Ekadashi Vrat Date and Muhurat)

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष के दौरान ग्यारहवें दिन (एकादशी) को आती है। इंग्लिश कलेंडर के अनुसार, यह अगस्त-सितंबर में पड़ता है। इस वर्ष 2021 में उत्पन्ना एकादशी, 30 नवम्बर को है।

Utpanna Ekadashi 2021 is on November 30 Tuesday

सूर्योदय (Sunrise)30 November 6:54 AM
सूर्यास्त (Sunset)30 November 5:36 PM
द्वादशी समाप्त (Dwadashi End)01 December 11:35 PM
एकादशी प्रारम्भ (Ekadashi Begins)30 November 4:14 AM
एकादशी समाप्त (Ekadashi End)01 December 2:14 AM
हरि वासरा समाप्त (Hari Vasara End)01 December 7:34 AM
पारण समय (Parana Time)01 December 7:34 AM – 9:03 AM

Utpanna Ekadashi festival dates between 2018 & 2028

YearDate
2021Tuesday, 30th of November
2022Sunday, 20th of November
2023Friday, 8th of December
2024Tuesday, 26th of November
2025Saturday, 15th of November

2021 एकादशी व्रत दिनांक सूची (ekadashi Vrat date list in 2021)

शुक्रवार, 23 अप्रैलकामदा एकादशी
शुक्रवार, 07 मईवरुथिनी एकादशी
रविवार, 23 मईमोहिनी एकादशी
रविवार, 06 जूनअपरा एकादशी
सोमवार, 21 जूननिर्जला एकादशी
सोमवार, 05 जुलाईयोगिनी एकादशी
मंगलवार, 20 जुलाईदेवशयनी एकादशी
बुधवार, 04 अगस्तकामिका एकादशी
बुधवार, 18 अगस्तश्रावण पुत्रदा एकादशी
शुक्रवार, 03 सितंबरअजा एकादशी
शुक्रवार, 17 सितंबरपरिवर्तिनी एकादशी
शनिवार, 02 अक्टूबरइन्दिरा एकादशी
शनिवार, 16 अक्टूबरपापांकुशा एकादशी
सोमवार, 01 नवंबररमा एकादशी
रविवार, 14 नवंबरदेवुत्थान एकादशी
मंगलवार, 30 नवंबरउत्पन्ना एकादशी
मंगलवार, 14 दिसंबरमोक्षदा एकादशी
गुरुवार, 30 दिसंबरसफला एकादशी

Last Updated on 25/04/2021

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