ऋषि वशिष्ठ (Guru Vashisht)

वशिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि, ब्रह्मा के मानस पुत्र और सप्तऋषियों में से एक है। वशिष्ठ राजा दशरथ के राजकुल गुरु भी थे।

गुरु वशिष्ठ को उनके क्षमाशीलता के लिए भी जाना जाता है। विश्वामित्र ने वशिष्ठ के 100 पुत्रों को मार दिया था, फिर भी इन्होंने विश्वामित्र को माफ कर दिया।


महर्षि वशिष्ठ (Guru Vashisht)

Ramabhadracharya Painting (1994)
नामऋषि वशिष्ठ, गुरु वशिष्ठ
जन्म विवरणमहर्षि वसिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों में विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। कहीं ये ब्रह्मा के मानस पुत्र, कहीं मित्रावरुण के पुत्र और कहीं अग्निपुत्र कहे गये हैं।
पत्नीअरुन्धती
रचनाएँयोगवासिष्ठ रामायण, वसिष्ठ धर्मसूत्र, वसिष्ठ संहिता, वसिष्ठ पुराण, धनुर्वेद
अन्य जानकारीमहर्षि वशिष्ठ श्री राम के कुल गुरु थे।
सम्बंधित लेखसप्तऋषि, ऋषि विश्वामित्र

महर्षि वशिष्ठ जन्म कथा (Maharshi Vashsith Birth Story)

महर्षि वशिष्ठ परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है।  

महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के 7 वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर 10 वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है।

वशिष्ठ का क्या अर्थ है?

वसिष्ठ का अर्थ है- सबसे प्रकाशवान, सबसे उत्कृष्ट, सबमें श्रेष्ठ और महिमावंत।

वसिष्ठ सप्तर्षि में से एक, सूर्यवंशी राजा दशरथ के राजकुल गुरु भी थे। सूर्य वंशी राजा इनकी आज्ञा के बिना कोई धार्मिक कार्य नही करते थे।

ऋग्वेद के 7 वें अध्याय में ये बताया गया है कि सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने अपना आश्रम सिंधु नदी के किनारे बसाया था। बाद में इन्होने गंगा और सरयू के किनारे भी अपने आश्रम की स्थापना की।

ऋषि वशिष्ठ ने सरयू नदी के किनारे गुरुकुल की स्थापना की थी। जहां पर हजारों राजकुमार और अन्य सामान्य छात्र गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त करते थे। यही पर राम, लक्षमण, भरत और शत्रुघ्न ने भी शिक्षा अर्जित किया था।

महर्षि वशिष्ठ के पास कामधेनु गाय और नंदिनी नाम की बेटी थी. ये दोनों ही मायावी थी। कामधेनु और नंदिनी उन्हें सब कुछ दे सकती थी।

ऋषि वशिष्ठ शांति प्रिय, महान और परमज्ञानी थे। विश्वामित्र ने इनके 100 पुत्रों को मार दिया था, फिर भी इन्होंने विश्वामित्र को माफ कर दिया।

महर्षि वशिष्ठ, योगवशिष्ठ रामायण, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण आदि के जनक हैं। बौद्ध धर्म में भी जिन 10 महान ऋषियों का वर्णन है, उनमे से एक महर्षि वशिष्ठ हैं।

स्वयं श्री आदिशंकराचार्य ने महर्षि वशिष्ठ को वेदांत के आदि ऋषियों में प्रथम स्थान प्रदान किया है। मान्यता अनुसार- वशिष्ठ त्रेतायुग के अंत मे ब्रम्हा लोक चले गए थे।

महर्षि वशिष्ठ की पत्नी कौन थी?

महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति (कर्दम ऋषि की पुत्री) थी। सौभयशाली महिलाओं को अरुंधति के चरित्र से प्रेरणाएं प्राप्त होती हैं।

अपनी पत्नी अरुंधति के साथ महर्षि वशिष्ठ एक आदर्श, श्रेष्ठ एवं उत्तम गृहस्थ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वशिष्ठ को स्थित माना जाता है।


ब्रह्मऋषि वशिष्ठ और कामधेनु (Story of Kamdhenu and Maharishi Vashisht in Hindi)

प्राचीन काल में एक महान राजा हुए गाधि हुए थे, उनके पुत्र थे राजा कौशिक। जो अपने पिता के समान ही प्रतापी थे, उनके यश की कीर्ति चारो दिशा में फैली हुई थी। यही आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए।

एक बार राजा कौशिक अपनी एक अक्षौहिणी सेना लेकर वन से गुजर रहे थे। मार्ग में महर्षि वशिष्ठ का आश्रम देख उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके आश्रम पहुँचे।

राज्य के राजा को अपने आश्रम में आया देख। महर्षि वशिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वे कुछ दिन अपनी सेना के साथ उनका आथित्य ग्रहण करें।

ये सुनकर विश्वामित्र ने कहा- ‘हे महर्षि! मैं तो यहाँ केवल आपके दर्शनों के लिए आया था। मैं आपको कष्ट नहीं देना चाहता। आप किस प्रकार मेरी एक अक्षौहिणी खान पान की व्यवस्था करेंगे?

तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा- ‘राजन! आप चिंता ना करें। मेरे पास गौमाता कामधेनु की पुत्री नंदिनी है जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है।

ये सुनकर विश्वामित्र कौतूहलवश महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रुक गए।विश्वामित्र को ये देख कर आश्चर्य हुआ कि नंदिनी हर सामग्री क्षणों में उपस्थित कर देती थी।

तब उन्होंने सोचा कि ऐसी गाय की अधिक आवश्यकता तो उन्हें है। यही सोच कर विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ से नंदिनी गाय देने का आग्रह किया। किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें नंदनी को देने से इंकार कर दिया।

जब बार आग्रह करने पर भी महर्षि वशिष्ठ नही माने। तो राजा कौशिक ने बल पूर्वक नंदनी को ले जाना चाहा। परन्तु महर्षि वशिष्ठ ने राजा कौशिक की एक अक्षौहिणी सेना को परास्त कर दिया।

एक ब्राह्मण से हारकर विश्वामित्र घोर शोक में घिर गए और तब उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से प्रतिशोध लेने की ठानी। उन्होंने अपने उस एक पुत्र को राज-पाठ सौंपा और तपस्या करने हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए।

उन्होंने हिमालय में घोर तपस्या की और ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिया। दिव्यास्त्र प्राप्त कर वे प्रतिशोध लेने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और महर्षि वशिष्ठ को युद्ध के लिए ललकारा।

उन्होंने एक एक कर महर्षि वशिष्ठ पर व्यवयास्त्र, आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पर्वतास्त्र, पर्जन्यास्त्र, गंधर्वास्त्र, मोहनास्त्र इत्यादि सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया। किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने उन सभी दिव्यास्त्रों को बीच में ही रोक दिया।

अंत में कोई और उपाय ना देखकर विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ पर ‘ब्रह्मास्त्र‘ का प्रयोग किया। जवाब में वशिष्ठ ने महाविनाशकारी ‘ब्रह्माण्ड अस्त्र’ (ब्रह्माण्ड अस्त्र ब्रह्मास्त्र से 5 गुणा अधिक शक्तिशाली माना जाता है) को प्रकट किया जो विश्वामित्र के ब्रह्मास्त्र को काट दिया।

विश्वामित्र को बार बार पराजित करने पर भी महर्षि वशिष्ठ ने उनका वध नहीं किया। इससे और भी अपमानित होकर विश्वामित्र वहां से चले गए।

विश्वामित्र के मन में ये विचार आया कि मैं छिपकर वशिष्ठ पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार करूँगा जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी। जब वो नहीं रहेंगे तो सारा जगत मुझे ही ‘ब्रह्मर्षि’ मानेगा। ये कुत्सित विचार लेकर विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे।

देवी अरुंधति कह रही थी- ‘हे स्वामी! आज की चाँदनी रात कितनी सुहानी है। इस जगत में इसके अतिरिक्त ऐसा प्रकाश और कहाँ प्राप्त हो सकता है?’ तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा- ‘प्रिये! निश्चय ही ये शीतलता और प्रकाश अद्भुत है किन्तु इससे भी अधिक शीतलता और प्रकाश राजर्षि विश्वामित्र के तप में है।’

अपने प्रति महर्षि वशिष्ठ का ये कोमल भाव देख कर विश्वामित्र इस ग्लानि को लेकर एक बार फिर घोर तपस्या में लीन हो गए। तब अंततः अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा से स्वयं वशिष्ठ वहाँ आये और उन्होंने विश्वामित्र को ‘ब्रह्मर्षि’ कहकर सम्बोधित किया।


महर्षि वशिष्ठ सूर्यवंश के गुरु क्यों बने?


महर्षि वशिष्ठ की ख्याति विशेषकर इक्षवाकु कुल के कुलगुरु के रूप में है। वे महाराज इक्षवाकु को राजधर्म की शिक्षा देते हैं और आगे चलकर उनकी कई पीढ़ि (महाराज दशरथ और उनके पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न आदि) के भी गुरु बने।

इसी विषय में एक कथा आती है। एक बार परमपिता ब्रह्मा महर्षि वशिष्ठ को सूर्यवंश के कुुुलगुुुुरु का दायित्व सँभालने के लिए कहा। साथ मे ब्रह्मा ने यह भी बताया कि इसी कुल में आगे जाकर भगवान विष्णु श्रीराम अवतार में जन्म लेंगे और उन्हें उनका गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

ब्रह्मा की ये बात सुनकर महर्षि वशिष्ठ सहर्ष सूर्यवंश के कुलगुरु का स्थान स्वीकार कर लेते हैं।


महर्षि वशिष्ठ के प्रसिद्ध मंदिर और आश्रम (Famous Rishi Vashishth temple and Asaram)

रामायण अनुसार अयोध्या में 40 एकड़ की ज़मीन पर महर्षि वशिष्ठ का आश्रम था। जो आज के समय में सिर्फ एक चौथाई हिस्सा ही रह गया है। आश्रम में एक कुआँ है जहां से सरयु नदी निकलती है।

असम के गुवाहाटी में महर्षि वशिष्ठ को समर्पित एक भव्य मंदिर और आश्रम है। यह आश्रम गुवाहाटी शहर से दक्षिण में असम-मेघालय सीमा के करीब स्थित है और गुवाहाटी का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है। एक अन्य महर्षि वशिष्ठ मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के वशिष्ठ गांव में है। इस गांव का नाम महर्षि वशिष्ठ के नाम पर ही रखा गया है।

उत्तराखंड के ऋषिकेश से लगभग 18 किलोमीटर दूर शिवपुरी गंगा के किनारे वशिष्ठ गुफा है। इसे स्थानीय निवासी वशिष्ठ का शीतकालीन निवास मानते है। नज़दीक ही अरुंधति गुफा और शिव मंदिर है। जिसमे भगवान शिव की कई प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं।

केरल के त्रिसूर जिले में स्थित अरट्टुपुझा मंदिर के मुख्य देवता भी महर्षि वशिष्ठ ही हैं।


Last Updated on 03/05/2021

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