वायु पुराण

वायु पुराण हिंदुओं के पवित्र 18 पुराणो में से एक हैं। यह एक शैव पुराण हैं। वायुदेव के श्वेतकल्प प्रसंगों में धर्मों का उपदेश देने के कारण इसे वायु पुराण कहते है।

The Vayu Purana (Sanskrit: वायु पुराण) is a Sanskrit text and one of the eighteen major Puranas of Hinduism. 


वायु पुराण (Vayu Puran Wiki)

नामवायु पुराण
सम्बन्धपुराण
सम्बंधित देवविष्णु
अध्याय / श्लोक112 अध्याय, 11,000 श्लोक
रचियतामहर्षि वेदव्यास

वायु पुराण क्या हैं? (Vayu purana in Hindi)

वायु पुराण हिंदुओं के पवित्र 18 पुराणों में से एक पुराण है। नारद पुराण में दी गई पुराण सूची के अनुसार इसका स्थान चतुर्थ है। यह एक शैव पुराण है, फिर भी इसमें वैष्णव मत पर विस्तृत प्रतिपादन मिलता है।  इस पुराण में वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसंगों में धर्मों का उपदेश किया है। इसलिये इसे ‘वायु पुराण’ कहते है।

दो खंड, 112 अध्याय और 11,000 श्लोको में विभक्त है इस पुराण में इसमें खगोल, भूगोल, सृष्टिक्रम, युग, तीर्थ, पितर, श्राद्ध, राजवंश, ऋषिवंश, वेद शाखाएं, संगीत शास्त्र, शिवभक्ति, आदि का भी सविस्तार निरूपण किया गया है।


वायु पुराण कथा का प्रारम्भ (Story of the Vayu Purana in Hindi)

प्राचीन समय की बात हैं, राजाओं में श्रेष्ठ राजा असीम कृष्ण पृथ्वी पर राज्य करते थे। एक बार पुण्य सलिला दृशद्वती नदी के किनारे कुरुक्षेत्र में सरल चित्त बलि सत्यव्रती ऋषियों ने यज्ञ प्रारम्भ किया। वहाँ उनके दर्शन करने के लिए ऋषि सूतजी भी पधारे। सूतजी मूनि व्यास के मेधावी छात्र थे। तीनों लोकों में उनकी ख्याति थीं।

सभी वेदों पुराणों तथा महाभारत को पल्लवित करने वाली उनकी शक्ति मतिवाणी में सभी को रोमांचित करने की क्षमता थी। महामना सूतजी को यज्ञ में आया जानकर सभी ऋषियों के मन में उनसे पुराण कथा सुनने की इच्छा हुई।

यज्ञ के ग्रहपति ने ऋषियों के मनोभाव जानकार सूतजी से निवेदन किया कि पुराण कथा सुनाकर उन्हे कृतार्थ करें। सूतजी जी विनत्ति स्वीकार कर लेते हैं और वायु पुराण की कथा सुनाने लगते है-   


वायु पुराण में क्या है? (What is in Varyu purana in hindi)

वायु पुराण के 112 अध्याय में कुल 11,000 श्लोक हैं। इस पुराण में शिव उपासना की चर्चा अधिक होने के कारण कुछ विद्वान लोग ‘वायु पुराण’ को स्वतन्त्र पुराण न मानकर ‘शिव पुराण’ और ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ का ही अंग मानते हैं। परन्तु ‘नारद पुराण’ में जिन अठारह पुराणों की सूची दी गई हैं, उनमें ‘वायु पुराण’ को स्वतन्त्र पुराण माना गया है। ब्रह्माण्ड की भाँति यह भी चार पादों में विभाजित है, यथा-

  1. प्रक्रिया
  2. अनुषंग
  3. उपोद्घात एवं
  4. उपसंहार।

इसमें शुरू में ऋषि पूजित पुराण का भली भांति वर्णन हैं। साथ ही वासवी पित्तरों की मानसी कन्या की कथा हैं, जो श्राप के कारण मछ्ली के रूप में पैदा हुई। महेश्वर योग के अनुसार 5 प्रकर के धर्मों का वर्णन हैं। साथ ही सूतजी ने यतियों के प्रायश्चित विधान के बारे में बताया हैं, कि धर्म को जानने वालों ने काम कृत और अकाम कृत दोनों ही पापो के लिए प्रायश्चित करने का विधान दिया हैं। औकार के लक्षण बताए हैं। इसमे शुरू में सृष्टि प्रकरण बड़े विस्तार से चित्रित हैं और कल्पो का निरूप अन्य पुराणों से भिन्न हैं।

इस पुराण में भारतवर्ष की शोभा का वर्णन किया गया हैं। नदी, खंड, पर्वत, रमणीय स्थलों व द्वीपो का सुंदर चित्रण हैं। इसमें बताया गया हैं कि भारत में 10 योजन का एक महासागर हैं। साथ ही लंका के बारे में भी बताया गया हैं। सूतजी ने देवों के विख्यात ग्रहों का वर्णन भी किया हैं।

आगे इस पुराण में वरुण वंश का वर्णन हैं व साथ ही मार्तंड का परिचय दिया हैं। राजा सागर व उनके वंशों का परिचय व कथा कही गई हैं, चंद्र वंश का वर्णन किया गया हैं। उर्वशी व पुरुरवा कि कथा का बहुत ही सुंदर ढंग से वर्णन किया गया हैं। महाराज राज की कथा हैं, जिसके सौ पुत्र थे। राजा ययाति की कथा का विस्तार से वर्णन हैं।

साथ ही ही ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु वंश का वर्णन हैं। हिरण्यकश्यपू की कथा कही गई हैं। जिसका अंत विष्णु भगवान ने नरसिंह के रूप में अवतार लेकर किया था। राजा पुरू के वंश का वर्णन हैं। धृतराष्ट्र व गांधारी के सौ पुत्रों के उत्तपन्न होने की कथा हैं।


संरचना (Structure)

पूर्व भाग (Purva Khand)

जिसमें सर्ग आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहां भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में राजाओं के वंश का वर्णन है और जहां गयासुर के वध की कथा विस्तार के साथ कही गयी है, जिसमें सब मासों का माहात्मय बताकर माघ मास का अधिक फ़ल कहा गया है जहां दान दर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तार से कहे गये हैं, जिसमें पृथ्वी पाताल दिशा और आकाश में विचरने वाले जीवों के और व्रत आदि के सम्बन्ध में निर्णय किया गया है, वह वायुपुराण का पूर्वभाग कहा गया है।

उत्तर भाग (Uttar Khand)

उत्तरभाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है, और विस्तार के साथ शिवसंहिता कही गयी है जो भगवान सम्पूर्ण देवताओं के लिये दुर्जेय और सनातन है, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते है, वही यह नर्मदा का जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है, और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात शिव है।

यह नर्मदा जल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है, निश्चय ही भगवान शिवने समस्त लोकों का हित करने के लिये अपने शरीर से इस नर्मदा नदी के रूप में किसी दिव्य शक्ति को ही धरती पर उतारा है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते है, वे भगवान रुद्र के अनुचर होते है, और जिनका दक्षिण तट पर निवास है, वे भगवान विष्णु के लोकों में जाते हैं।

ऊँकारेश्वर से लेकर पश्चिम समुद्र तट तक नर्मदा नदी में दूसरी नदियों के पैतीस पापनाशक संगम है, उनमे से ग्यारह तो उत्तर तटपर है, और तेईस दक्षिण तट पर। पैंतीसवां तो स्वयं नर्मदा और समुद्र का संगम कहा गया है, नर्मदा के दोनों किनारों पर इन संगमों के साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ है। मुनीश्वर ! इनके सिवाय अन्य साधारण तीर्थ तो नर्मदा के पग पग पर विद्यमान है, जिनकी संख्या साठ करोड साठ हजार है।

यह परमात्मा शिव की संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवता ने नर्मदा के चरित्र का वर्णन किया है, जो इस पुराण को सुनता है या पढता है, वह शिवलोक का भागी होता है।


वायु पुराण का महत्व (Importance of vayu Purana in Hindii)

वायु पुराण हिदुओं के पवित्र 18 पुराणों में से एक हैं। शैव पुराण होने के कारण शैव संप्रदाय के लोगों के लिए विशेष पूजनीय भी हैं। इस पुराण में भारत वर्ष के नदी, खंड, पर्वत, महासागर, द्वीप आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया हैं, जिस कारण यह पुराण भौगोलिक वर्णन की दृष्टि से भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता हैं।

यह पुराण भले अन्य पुराण की तुलना श्लोक संख्या की दृष्टि से न्यून है। फिर भी इसमे युग, यज्ञ, ऋषियों व तीर्थों का बहुत विस्तार से वर्णन किया गया हैं। इस पुराण विशेष पठनीय हैं।


वायु पुराण पीडीएफ (Vayu Puran Hindi PDF Free Download)

Last Updated on 21/05/2021